भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६८ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-
समान भाग मिश्रित कल्कके साथ तिलके तैलको यथाविधि पकावै । यह बृहन्मा- षनामक तैल नस्य, बस्तिक्रिया और मालिशद्वारा प्रयोग करनेसे अपबाहुकवात, अर्द्धाङ्गशोष, अपतानक, आन्ध्रवात, आक्षेपक वातरोग, बाहुकम्प, शिरःकम्प एवं कमर, जंघा और जानुगत सर्वप्रकारके रोगोंको निवारण करता है ॥ ३९-४१॥
सप्तप्रस्थमहामाषतैल ।
माषक्वाथे बलाक्वाथे रास्नाया दशमूलजे । यवकोलकुलत्थानां छागमांसरसे पृथक् ॥ ४२ ॥ प्रस्थे तैलस्य च प्रस्थं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम्। रास्नात्मगुप्तासिन्धूत्थशताह्वैरण्डमुस्तकैः ॥ जीवनीयबलाव्योषैः पचेदक्षसमैर्भिषक् ॥ ४३ ॥ हस्तकम्पे शिरःकम्पे बाधिर्ये चापबाहुके । बाहुशोषे कर्णशूले कर्णनादे च दारुणे ॥ ४४ ॥ विश्वाच्यामर्दिते कौब्ज्ये गृध्रस्यामपतानके । वस्त्यभ्यञ्जनपानेषु नावने च प्रयोजयेत् ॥ ४५ ॥ माषतैलमिदं श्रेष्ठमूर्ध्वजत्रुगदापहम् । क्वाथप्रस्थाः षडेवात्र विभक्त्यन्तेन दर्शिताः ॥ ४६ ॥
उडदोंका क्वाथ, खिरैंटीका क्वाथ, रास्नाका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ एवं जौं बेर, कुलथी इन तीनोंका मिश्रित क्वाथ और बकरेका मांसरस ये प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर एकत्र मिलालेवे । फिर उसमें तिलका तेल एक प्रस्थ, दूध चार प्रस्थ एवं रास्ना, कौंचके बीज, सैन्धानमक, सोया, अण्डकी जड, नागरमोथा, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, खिरैंटी, सोंठ, मिरच और पीपल इन प्रत्येकके कल्कको दो दो तोले डालकर उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे । इस तैलको हस्तकम्प, शिरःकम्प, बधिरता, अपबा- हुक, बाहुशोष, कर्णशूल, दारुण कर्णनाद, विश्वाची, अर्दित, कुबडापन, गृध्रसी, अपतानक आदि वातरोगोंमें बस्तिक्रिया, मर्द्दन, पान और नस्यकर्मद्वारा प्रयोग करनेसे शीघ्र लाभ होता है। यह तेल ऊर्ध्वजत्रुरोगको नाश करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ औषध है । इसमें छः क्वाथ एक एक प्रस्थ लेना । यह बात क्वाथद्रव्यवाचक- शब्दोंके अन्तमें स्थित विभक्तियों द्वारा मालूम होती है ॥