भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६९

महामाषतैल ।

माषस्यार्द्धाढकं दत्त्वा तुलार्द्धं दशमूलतः ।
पलानि च्छागमांसस्य त्रिंशद्रोणेऽम्भसः पचेत् ॥ ४७ ॥
पूतशीते कषाये च चतुर्थांशावशेषिते ।
प्रस्थं च तिलतैलं च पयो दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ ४८ ॥
आत्मगुप्ता रुबूकं च शताह्वा लवणत्रयम् ।
जीवनीयानि मञ्जिष्ठा चव्यचित्रककट्फलम् ॥ ४९ ॥
सव्योषं पिप्पलीमूलं रास्ना मधुकसैन्धवम् ।
देवदार्वमृता कुष्ठं वाजिगन्धा वचा शठी ॥
एतैरक्षसमैर्भागैः साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ५० ॥

कपडेकी पोटलीमें बंधेहुए उडद अर्द्धाढक, दशमूल ५० पल और पोटलीमें बँधाहुआ बकरेका मांस ३० पल लेकर इन सबको १ द्रोण जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर शीतल होनेपर वस्त्रमें छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ एवं कौंच, अण्डकी जड, सोया, सेंधानमक, विरियासञ्चरनमक, कालानमक, जीवनीयगणकी दशों ओषधियाँ, मंजीठ, चव्य, चीतेकी जड, कायफल, त्रिकुटा, पीपलामूल, रास्ना, मुलहठी, सैंधानमक, देवदारु, गिलोय, कूठ, असगन्ध, वच और कचूर इन सब ओषधियोंके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा तैलको पकावे ॥ ४७–५० ॥

पक्षाघातेऽर्दिते वाते बाधिर्य्ये हनुसंग्रहे ।
कर्णमन्याशिरःशूले तिमिरे च त्रिदोषजे ॥ ५१ ॥
पाणिपादशिरोग्रीवाभ्रमणेमन्दसंक्रमे ।
कलायखञ्जे पाङ्गुल्ये गृध्रस्यामपबाहुके ॥ ५२ ॥
पाने वस्तौ तथाऽभ्यङ्गे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।
तैलमेतत्प्रशंसन्ति सर्व्ववातरुजापहम् ॥ ५३ ॥

यह तैल—पक्षाघात, अर्दितवात, बधिरता, हनुग्रह, कर्णशूल, मन्यास्तम्भ, शिरःशूल, त्रिदोषज तिमिररोग, हाथ, पाँव, शिर और गर्दनका हिलना, शनैः शनैः चलना, कलायखञ्ज, पंगुता, गृध्रसीवात और अपबाहुक आदि वातरोगोंमें अत्यन्त प्रशंसनीय