भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६८० | भैषज्यरत्नावली | [ वातव्याधि- |
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अनेनैव च तैलेन शुष्यमाणा महाद्रुमाः।
सिक्ताः पुनः प्ररोहन्ति भवन्ति फलशालिनः ॥ १६ ॥
वृद्धोऽप्यनेन तैलेन पुनश्च तरुणायते।
न प्रसूते च या नारी साऽपि पीत्वा प्रसूयते ॥ १७ ॥
अप्रजाः पुरुषो यस्तु सोऽपि पीत्वा लभेत्सुतम् ॥ १८ ॥
यह तैल किशोर अवस्थावाले मनुष्य एवं घोडा, घोडी, हाथी, गाय, बैल आदि पशुओंको भी अमृतकी समान हितकारी है। इस तैलके द्वारा सींचनेसे बडे बडे सूखे वृक्ष फिरसे हरे भरे और फल फूलयुक्त होजाते हैं। वृद्ध मनुष्य भी इस तैलके सेवनसे फिर तरुण होजाता है। जिस स्त्रीके सन्तान पैदा नहीं होती इस तैलको पान करनेसे उस स्त्रीके भी सन्तान उत्पन्न होती है। जो मनुष्य सन्तानहीन है वह भी इसको पान करके पुत्रको प्राप्त करता है ॥ १५-१८ ॥
अशीतिं वातजान्रोगान्पैत्तिकाञ्श्लैष्मिकानपि।
सन्निपातसमुत्थांश्च नाशयेत्क्षिप्रमेव हि ॥ १९ ॥
एतेनान्धकवृष्णीनां कृतं पुंसवनं महत्।
कृत्वा विष्णोर्बलिं चापि तैलमेतत्प्रयोजयेत् ॥ ४२० ॥
यह तैल अस्सी प्रकारके वातजरोग एवं पित्तज और कफज सर्वप्रकारके रोग और सन्निपातसे उत्पन्नहुए सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नष्ट करता है। इस तैलके प्रभावसे अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंको अत्यन्त सन्तानोत्पत्ति हुई थी। प्रथम विष्णुभगवान्का यथाविधि पूजन कर फिर इस तैलको प्रयोग करना चाहिये ॥ ४१९ ॥ ४२० ॥
महाराजप्रसारणीतैल ।
शतत्रयं प्रसारण्या द्वे पीतात्सहचारकात्।
अश्वगन्धैरण्डबला वरी रास्ना पुनर्नवा ॥ २१ ॥
केतकी दशमूलं च पृथक् त्वक् पारिभद्रकः।
एषां तुलां तु प्रत्येकं तुलार्द्धं किलिमात्तथा ॥ २२ ॥
तुलार्द्धं स्याच्छिरीषाच्च लाक्षायाः पञ्चविंशतिः।
पलानि लोध्राच्च तथा सर्वमेकत्र साधयेत् ॥ २३ ॥