भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 713

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६८१


जलपञ्चाढकशते सपादे तत्र शेषयेत् ।
द्रोणद्वयं काञ्जिकस्य षड्विंशत्याढकोन्मितम् ॥ २४ ॥
क्षीरदध्नोः पृथक् प्रस्थान् दशमस्त्वथाढकं तथा ।
इक्षो रसाढकौ चापि छागमांसतुलात्रये ॥ २५ ॥
पञ्चचत्वारिंशदम्भःप्रस्थान् पक्त्वा तु शेषयेत् ।
सप्तदश रसप्रस्थान् मञ्जिष्ठाक्वाथ एव च ॥ २६ ॥
कुडवोनाढकोन्मानो द्रव्यैरेभिस्तु साधयेत् ।
सुशुद्धं तिलतैलस्य द्रोणं प्रस्थेन संयुतम् ॥ २७ ॥

गन्धप्रसारिणी ३०० पल, पीले फूलकी कटसरैया २०० पल, असगन्ध, अण्डकी जड, खिरैंटी, शतावर, रास्ना, पुनर्नवा केतकी, दशमूल और फरहदकी छाल ये प्रत्येक सौ सौ पल, देवदारु ५० पल, शिरसकी छाल ५० पल, लाख २५


१-काञ्जिकं मानतो द्रोणः शुक्तेनात्र विधीयते ।

शुक्तविधि ।

अत्र शुक्तविधिर्मण्डप्रस्थः पञ्चाढकोन्मितम् । काञ्जिकं कुडवं दध्नो गुडप्रस्थो-
म्लमूलक।त् ॥ पलान्यष्टौ शोधिताद्र्रात् पलषोडशिकं तथा । कणाजीरकसिं-
न्धूत्थं हरिद्रामरिचं पृथक् ॥ द्विपलं भाविते भाण्डे घृतेनाष्टदिनं स्थितम् । सिद्धं
भवति तच्छुक्तं यदावतार्य गृह्यते ॥ तदा देयं चतुर्जातं पृथक् कर्षत्रयोन्मितम्।
पञ्चपल्लवतोयेन गन्धानां क्षालनं तथा ॥

( यद्यपि मूलमें काँजीका परिमाण २६ आढक लिखा है तथापि वृद्ध वैद्योंके मतसे १ द्रोण ही डालनी चाहिये, क्योंकि अधिक डालनेसे काँजीकी गन्ध आने लगती है । ) इसमें काँजीको एक द्रोण परिमाण शुक्तके साथ डालना चाहिये । भातका माँड १ प्रस्थ, काँजी ५ आढक, दही १६ तोले, गुड १ प्रस्थ, अम्लमूलक ( काँजीके नीचेकी जमी हुई गाद ) आठ पल, शुद्ध अदरख १६ पल एवं पीपल, जीरा, सेंधा नमक, हल्दी और कालीमिरच ये प्रत्येक ओषधि दो दो पल लेवे । इन सबको घीसे भावना दियेहुए पात्रमें भरकर उसका मुख बन्दकरके आठ दिनतक रखा रहनेदेवे । जब उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब उसको निकालकर छानलेवे । फिर उसमें दारचीनी, तेजपात, इलायची और नागकेशर इनको तीन तीन कर्ष बारीक पीसकर मिलादेवे । इसको शुक्त कहते हैं ॥ यह शुक्तही महाराजप्रसारणी तैलमें काँजीके बदलेमें डालाजाता है । इसके सम्पूर्ण गन्धद्रव्योंको पञ्चपल्लवके क्वाथसे धोकर सुखालेना ।

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित) · पृष्ठ 713, कुल 1416 में से · BharatKosha