भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८२ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-
पल और लोध २५ पल सबको एकत्र कूटकर ५२५ आढक जलमें पकावे । जब पकते पकते दो द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर काँजी १ द्रोण, दूध दस प्रस्थ, दही दस प्रस्थ, दहीका तोड एक आढक, ईखका रस ३ आढक और बकरेके मांसको ३०० पल लेकर ४५ प्रस्थ जलमें पकावे । जब पककर १७ प्रस्थ जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । मञ्जीठका क्वाथ १५ शराव परिमाण इन सब द्रव्योंके साथ उत्तम तिलका तैल १ द्रोण १ प्रस्थ मिलाकर पकावे ॥ २१–२७ ॥
आद्य एभिर्द्रवैः पाकः कल्कौ भल्लातकं कणा ।
नागरं मरिचं चैव प्रत्येकं षट्पलोन्मितम् ॥ २८ ॥
पथ्याक्षधात्र्यः सरलं शताह्वा कर्कटी वचा ।
चोरपुष्पी शठी मुस्तद्वयं पद्मं च सोत्पलम् ॥ २९ ॥
पिप्पलीमूलमञ्जिष्ठा साश्वगन्धा पुनर्नवा ।
दशमूलं समुदितं चक्रमर्दो रसाञ्जनम् ॥ ४३० ॥
गन्धतृणं हरिद्रा च जीवनीयो गणस्तथा ।
एषां त्रिपलिकैर्भागैराद्यः पाको विधीयते ॥ ३१ ॥
पकते समय उसमें भिलावे (अभावमें लालचन्दन), पीपल, सोंठ और मिरच ये प्रत्येक छः छः पल, हरड, बहेडा, आमला, धूपसरल, सोया, काकडासिंगी, वच, चोरपुष्पी, कचूर, नागरमोथा, मोथा, कमल, नीलकमल, पीपलामूल, मंजीठ, असगन्ध, पुनर्नवा, दशमूल, चकवड, रसौंत, सुगन्धतृण, हल्दी, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती और मुलहठी इन सबके तीन तीन पल कल्कको डालकर प्रथम पाक करे ॥ २८–४३१ ॥
देवपुष्पी बोलपत्रं शल्लकीरसशैलजे ।
प्रियंगूशीरमधुरी मांसी दारु बलाऽचलम् ॥ ३२ ॥
श्रीवासो नलिका खोटिः सूक्ष्मैला कुन्दुरुर्मुुरा ।
नखीत्रयं च त्वक्पत्री परमा पूतिचम्पकम् ॥ ३३ ॥
मदनं रेणुका पृक्का मरुवं च पलत्रयम् ।
प्रत्येकं गन्धतोयेन द्वितीयः पाक इष्यते ॥ ३४ ॥
१ भल्लातकासहत्वे तु रक्तचन्दनमिष्यते ।