भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा भाषाटीकासहिता । ६८३
पश्चात् चोरपुष्पी, गन्धबोल, तेजपात, शल्लकी रस (राल), भूरिछरीला, फूलप्रियंगु, खस, सौंफ, बालछड, देवदारु, खिरेंटी, शिलारस, सरलका गोंद, नलिका, पालकका शाक, छोटी इलायची, कुन्दुरु, सुरामांसी, तीनों प्रकारका नखीद्रव्य-अर्थात् बेरके पत्तेकी समान, नीलकमलके पत्तेकी समान कान्तिवान् और घोडेके खुरकी समान आकारवाली तेजपात, गन्धपलाशी, खट्टासमूष्क, चम्पाके फूल, मैनफल, रेणुका, असवरग और मरुआ (छोटे पत्तोंकी तुलसी) इन प्रत्येकके बारह बारह तोले कल्क और गन्धोदकके साथ तेलका दूसरा पाक करे ॥ ३२-३४ ॥
गन्धोदकं तु त्वक्पत्री पत्रकोशीरमुस्तकम् ।
प्रत्येकं सबलामूलं पलानि पञ्चविंशतिः ॥ ३५ ॥
कुष्ठार्द्धभागोऽत्र जलप्रस्था वै पञ्चविंशतिः ।
अर्द्धावशिष्टाः कर्त्तव्याः पाके गन्धाम्बुकर्मणि ॥ ३६ ॥
गन्धोदक बनानेकी विधि—तेजपात, सुगन्धितपत्र (तेजपातकी समान पत्रविशेष), खस, नागरमोथा और खिरेंटीकी जड ये प्रत्येक ओषधि पच्चीस पच्चीस पल और कूठ साढे बारह पल लेकर सबको एकत्र २५ प्रस्थ जलमें पकावे। जब पकते पकते आधा जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। गन्धोदकका पाक करनेपर अर्द्धावशेष जल रखना चाहिये ॥ ३५–३६ ॥
गन्धाम्बुचन्दनाम्बुभ्यां तृतीयः पाक इष्यते ॥ ३७ ॥
संगृह्य चन्दनं श्वेतं पञ्चाशत्पलसंमितम् ।
तावत्येव जले पक्त्वा तच्छेषेऽर्द्धेऽवतारयेत् ॥
ततस्तु चन्दनं पिष्ट्वा मिश्रयेच्चन्दनोदकम् ॥ ३८ ॥
फिर गन्धोदक और निम्नलिखित चन्दनोदकके साथ तैलका तीसरा पाक करे।
चन्दनोदक बनानेकी विधि—सफेद चन्दनको ५० पल लेकर ५० सेर जलमें पकावे, २५ सेर शेष रहनेपर उतार लेवे। चन्दनको बारीक पीसकर जलमें घोलकर चन्दनोदक बनावे ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
कल्कोऽत्र केशरं कुष्ठं त्वक्कालीयंककुंकुमम् ।
भद्रश्रियं ग्रन्थिपर्णं लता कस्तूरिका तथा ॥ ३९ ॥
लवङ्गागुरुकक्कोलजातीकोषफलानि च ।
एला लवङ्गच्छल्ली च प्रत्येकं त्रिपलोन्मितम् ॥ ४० ॥