भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 716
६८४भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

कस्तूरी षट्पला चन्द्रात्पलं सार्द्धं च गृह्यते ॥ ४१ ॥

इस तीसरे पाकमें कल्कके लिये नागकेशर, कूट, दारचीनी, क्लम्बक (पिलाचन्दन), केशर, सफेदचन्दन, गठिवन, लताकस्तूरी, लौंग, अगर, सीतलचीनी, जावित्री, जायफल, इलायची और लौंगकी छाल ये प्रत्येक तीन तीन पल, कस्तूरी ६ पल और कपूर डेढ़ पल डालना चाहिये ॥ ३९-४१ ॥

वेधनार्थं पुनश्चन्द्रमदौ देयौ तथोन्मितौ ॥ ४२ ॥
महाप्रसारणी सेयं राजभोग्या प्रकीर्त्तिता ।
गुणान्प्रसारणीनां तु वहन्त्येषा बलोत्तमान् ॥ ४३ ॥

जब तैल उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब वेधनके लिये कपूर और कस्तूरीको पूर्वोक्त परिमाणमें पीसकर उस चूर्ण और थोडेसे तेलको एक बर्तनमें मिलालेवे । फिर उसको सिद्धहुए सम्पूर्ण तैलके साथ उत्तम प्रकारसे मिलाकर एक सकोरेसे ढककर रखदेवे । यह महाराजप्रसारणीतैल राजाओंके सेवन करनेयोग्य कहागया है । यह पूर्वोक्त प्रसारणी तैलोंके जो गुण हैं उनसे भी अधिक गुणोंकों करता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥

महासुगन्धितैल और लक्ष्मीविलासतैल ।

जिङ्गीचोरकदेवदारुसरलव्याघ्रीवचाचेलकात्वक्पत्रैः
सह गन्धपत्रकशठीपथ्याक्षधात्रीघनैः । एतैः शोधित-
संस्कृतैः पलयुगेत्याख्यातया संख्यया तैलप्रस्थ-
मवस्थितैः स्थिरमतिः कल्कैः पचेद्गान्धिकैः ॥ ४४ ॥
मांसीमुरामदनचम्पकसुन्दरीत्वग्ग्रन्त्यम्बुरुहमरुवकै-
र्द्विपलैः सप्तकैः । श्रीवासकुन्दुरुनखीनलिकाभिषीणां
प्रत्येकतः पलमुपास्य पुनः पचेत्तु ॥ ४५ ॥
एलालवङ्गचलचन्दनजातिपूतिकक्कोलकागुरुलता-
घुसृणैः पलार्द्धैः । कस्तूरिकाक्षसहितामलदीप्तियुक्तैः
पक्त्वा तु मन्दशिखिनैव महासुगन्धम् ॥ ४६ ॥
पञ्चाद्विकेन चार्द्धेन मदात्कर्पूरमिष्यते ।
कर्पूरमदयोरर्द्ध पत्रकल्कमिहेष्यते ॥ ४७ ॥
पक्वपूतेऽप्युष्ण एव सम्यक् पेषणवर्त्तितम् ।
दीयते गन्धवृद्ध्यर्थं पत्रकल्कं तदुच्यते ॥ ४८ ॥