भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६९१
यदि उक्त पित्तान्तक रसमें सोनामाखीको त्यागकर सुवर्णभस्म मिलादीजाय तो यही महापित्तान्तक रस कहा जाता है । यह सम्पूर्ण पित्तविकारोंको नाश करे ॥
गुडूचीतैल ।
गुडूचीक्वाथकल्काभ्यां सिद्धं तैलं प्रयत्नतः ।
वातरक्तं निहन्त्याशु नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ ॥
गिलोयके क्वाथ और कल्कके साथ विधिपूर्वक तिलके तैलको सिद्ध करे । यह तैल मर्दन करनेसे वातरक्त और पित्तरोगोंको निस्सन्देह शीघ्र नष्ट करता है ॥
पित्तरोगमें पथ्य ।
तिक्तस्वादुकषायशीतपवनच्छायानिशावीजनं
ज्योत्स्नाभूगृहयन्त्रवारि जलजं स्त्रीगात्रसंस्पर्शनम् ।
सर्पिःक्षीरविरेकसेकरुधिरस्रावप्रदेहादिकं
पानाहारविहारभेषजमिदं पित्तं प्रशान्तिं नयेत् ॥ १८॥
तिक्त ( कडवे ) रसवाले पदार्थ, मधुर और कषैले रसवाले पदार्थ, शीतल वायु, छाया, रात्रिकी वायु, पंखेकी वायु, चाँदनी, कच्चे मकान, फुहारेका जल, कमल, स्त्रीका आलिंगन, घृत, दूध, विरेचन, अभिषेचन, रुधिरस्राव कराना और प्रलेप आदि करना ये सम्पूर्ण पान और आहार, विहारादि औषधियाँ पित्तको शमन करती हैं ॥ १८ ॥
पित्तरोगमें अपथ्य ।
कट्वम्लोष्णविदाहितीक्ष्णलवणक्रोधोपवासातप-
स्त्रीसम्भोगतृषाक्षुधाभिहननव्यायाममद्यादिभिः ॥ १९ ॥
माषैस्तिलैःकुलत्थैश्च मत्स्यैर्मेषाभिषेण च ।
गव्येन दधितक्रेण नृणां पित्तं प्रकुप्यति ॥ २० ॥
चरपरेरस, खट्टे रस, गरम, दाहकारक, तीक्ष्ण और लवणयुक्त पदार्थ, क्रोध, उप-वास, धूप, स्त्रीप्रसंग, क्षुधा और तृषाके वेगको रोकना, व्यायाम, मद्यपान, उड़द, तिल, कुलथी, मछली, मेंडका मांस, गौका दही और मट्ठा इन समस्त पदार्थोंके द्वारा मनुष्योंके पित्त कुपित होता है ॥ १९ ॥ २० ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां पित्तरोगचिकित्सा ।