भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 724
६९२भैषज्यरत्नावली ।[ कफरोग-

कफरोगचिकित्सा ।

प्रथमं मुखमाधुर्यं तथैव मुखलिप्तता ।
तथा मुखप्रसेकश्च निद्राधिक्यं तथैव च ॥ १ ॥
कण्ठे घुर्घुरता चापि कटुकांशोष्णकामिता ।
बुद्धिमान्द्यमचैतन्यमालस्यं तृप्तिरेव च ॥ २ ॥
अग्निमान्द्यं मलाधिक्यं मलशैत्यं तथैव च ।
मूत्राधिक्यं मूत्रशौक्ल्यं शुक्राधिक्यं तथैव च ॥
स्तैमित्यं गौरवं शैत्यमेत एव हि विंशतिः ॥ ३ ॥
योगतो रूढितः प्रोक्तो मुनिभिः श्लैष्मिको गदः ।
बोद्धव्या स्वप्रकरणे चिकित्सैषां पृथक् पृथक् ॥ ४ ॥

प्रथम मुखमें मधुरताका होना, मुँहका लिहसासा रहना, मुँहसे पानीका गिरना, निद्राका अधिक आना, कण्ठमें घुर्घुर शब्द होना, चरपरे और गरम पदार्थोंकी इच्छा होना, बुद्धिकी मन्दता, मूर्च्छा, आलस्य और तृप्तिका होना, अग्निकी मन्दता, मलका अधिक और शितल होना, मूत्रकी अधिकता और सफेद होना, वीर्यकी अधिकता, शरीरमें आर्द्रता, गुरुता और शीतलताका होना ये २० प्रकारके कफके रोग योगसे विचारकर मुनियोंने वर्णन किये हैं। इनकी पृथक् पृथक् चिकित्सा मूलरोगाधिकारकी समान जाननी चाहिये ॥ १-४ ॥

कफश्चितो हि शिशिरे वसन्तेऽर्कांशुतापितः ।
हत्वाऽग्निं कुरुते रोगांस्तत्र तत्र प्रयोजयेत् ॥ ५ ॥
तीक्ष्णं वमननस्यादिकवलग्रहमञ्जनम् ।
व्यायामोद्वर्त्तनं धूमं शौचकार्ये सुखोदकम् ॥ ६ ॥

शिशिर ऋतुमें कफ उत्पन्न होता है और वसन्तऋतुमें सूर्यकी गर्मीसे पिघलकर अग्निको मन्द करके अनेक प्रकारके कफजन्य रोगोंको उत्पन्न करता है। इसलिये उस समय तीक्ष्ण पदार्थ, वमनकारक ओषधियाँ, नस्य, कवलधारण करना, अञ्जन आँजना, कसरत, उबटन, धूम्रपान एवं शौच और स्नानादि कार्योंमें गरम जल व्यवहार करना चाहिये ॥ ५ ॥ ६ ॥

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