भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ४३
वासास्वरस ।
सपत्रपुष्पवासाया रसः क्षौद्रसितायुतः ।
कफपित्तज्वरं हन्ति सास्रपित्तं सकामलम् ॥ २३० ॥
पत्ते, तथा फूलोंके सहित अडूसेका रस निकालकर उसमें शहद और मिश्री मिलाकर पान करनेसे रक्तपित्त और कामला (कमलवाय) सहित कफपित्तज्वर नष्ट होता है ॥ २३० ॥
नागरादि ।
नागरोशीरबिल्वाब्दधान्यमोचरसाम्बुभिः ।
कृतः क्वाथो भवेद्ग्राही. पित्तश्लेष्मज्वरापहः ॥ ३१ ॥
सोंठ, खस, बेलगिरी, नागरमोथा, धनियाँ, मोचरस और सुगन्धवाला इनका क्वाथ ग्राही (मलरोधक) और पित्तकफज्वरनाशक है ॥ ३१ ॥
गुडूच्यादि ।
गुडूची निम्बधन्याकं चन्दनं कटुरोहिणी ।
गुडूच्यादिरयं क्वाथः पाचनो दीपनः स्मृतः ॥
तृष्णादाहारुचिच्छर्दिपित्तश्लेष्मज्वरापहः ॥ ३२ ॥
गिलोय, नीमकी छाल, धनियाँ, लालचन्दन और कुटकी इनका क्वाथ पाचक अग्निप्रदीपक एवं तृषा, दाह, अरुचि, वमन और पित्तकफज्वरको दूर करनेवाला है ॥ ३२ ॥
भाङ्गर्यादि ।
भाङ्गीवचापर्पटकधान्यहिङ्ग्वभयाघनैः ।
काश्मर्यनागरैः क्वाथः सक्षौद्रः श्लेष्मपित्तजे ॥ ३३ ॥
भारङ्गी, वच, पित्तपापडा, धनियाँ, हींग, हरड, नागरमोथा, कुम्भेेर और सोंठ इनके क्वाथको शहदके साथ पित्तकफज्वरमें पान करनेसे लाभ होता है ॥ ३३ ॥
पटोलादि ।
पटोलं पिचुमन्दश्च त्रिफला मधुकं बला ।
साधितोऽयं कषायः स्यात्पित्तश्लेष्मोद्भवज्वरे ॥ ३४ ॥
परवल, नीमकी छाल, हरड, बहेडा, आमला, मुलहठी और खिरेंटी इनके द्वारा सिद्ध कियेहुए क्वाथको पित्तकफज्वरमें पान करनेसे विशेष लाभ होता है ॥ ३४ ॥