भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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४४ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-


भद्रमुस्तादि ।

भद्रमुस्ता नागरं वा गुडूच्यामलकाह्वयम् ।
पाठामृणालोदीच्यानि क्वाथः पित्तज्वरे कफे ॥ ३५ ॥

पित्तकफजन्यज्वरमें-नागरमोथा और सोंठ या गिलोय और आमले अथवा पाठ, खस और सुगन्धवाला इनमेंसे किसी एक योगको बनाकर क्वाथ पान करना चाहिये ॥ ३५ ॥

द्राक्षादि ।

द्राक्षामृतावासकनिम्बकानि भूनिम्बतिक्तेन्द्रयवाः पटोलम् ।
मुस्तासभार्ङ्गी क्वथितः कषायः सश्लेष्मपित्तज्वरनाशनाय ॥३६

दाख, गिलोय, अडूसा, नीमकी छाल, चिरायता, कुटकी, इन्द्रजौ, परवल, नागरमोथा और भारंगी इनका बनाया हुआ क्वाथ पित्तकफज्वरको नष्ट करनेके लिये उत्तम औषध है ॥ ३६ ॥

बृहद्गुडूच्यादि ।

गुडूचिका निम्बकवासकं च शठी किरातं मगधा बृहत्यौ ।
दार्वीं पटोलं क्वथितं कषायं पिबेन्नरः पित्तकफज्वरे च ३७॥

गिलोय, नीमकी छाल, अडूसा, कचूर, चिरायता, पीपल, कटेरी, बडी कटेरी, दारुहल्दी और परवल इनका क्वाथ पित्तकफज्वरमें पान करना चाहिये ॥३७॥

पञ्चतिक्तकषाय ।

क्षुद्रामृताभ्यां सह नागरेण सपौष्करं चैव किराततिक्तम् ।
पिबेत्कषायं त्विह पंचतिक्तं ज्वरं निहन्त्यष्टविधं समुग्रम् ३८

कटेरी, गिलोय, सोंठ, पोहकरमूल और चिरायता इन पाँचों ओषधियोंको एकत्र बनाकर क्वाथ पान करनेसे अत्यन्त उग्र आठों प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ३८ ॥

पटोलादि ।

पटोलयवधन्याकं मुद्गामलकचन्दनम् ।
पैत्तिके श्लेष्मपित्तोत्थे ज्वरे तृट्छर्दिदाहनुत् ॥ ३९ ॥

परवल, जौ, धनियां, मूँग, आमले और लालचन्दन इनके क्वाथको पित्तजज्वर और पित्तकफजन्य-ज्वरमें पान करनेसे ज्वर, तृषा, वमन, दाह आदि विकार दूर होते हैं ॥ ३९ ॥