भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ४५


वातश्लेष्मज्वरकी चिकित्सा।

रूक्षस्वेदाद्युपचार।

कफवातज्वरे स्वेदान् कारयेद्रूक्षनिर्मितान्।
स्रोतसां मार्दवं कृत्वा नीत्वा पावकमाशयम् ॥
हत्वा वातकफस्तम्भं स्वेदो ज्वरमपोहति ॥ २४० ॥
खर्परभृष्टस्थितकाञ्जिकसिक्तो हि वालुकास्वेदः।
शमयति वातकफामय मस्तकशुलाङ्गमर्दादीन् ॥ ४१ ॥
वीक्ष्य स्वेदविधिं कुर्यात्स्वेदनं वालुकादिभिः।
सर्वाङ्गे यदि वा यत्र वेदना संप्रजायते ॥ ४२ ॥
शीतशूलव्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे।
सञ्जातमार्दवे स्वेदे स्वेदनाद्विरतिर्मता ॥ ४३ ॥

वातश्लेष्म ज्वरमें-रोगीको रूक्ष पदार्थोंका स्वेद देना चाहिये, स्वेद देनेसे समस्त स्रोतोंमें मृदुता होती है, जठराग्नि प्रज्वलित होती है एवं कफ और वातका साम्य (जडता) नष्ट होकर ज्वर दूर होता है। एक मिट्टीके खीपरेमें वालुको भरम करके फिर कपडेकी पोटलीमें बाँधकर उसके ऊपर काँजी छिडक छिडककर स्वेद देवे। यह वालुकास्वेद वातश्लेष्मजनित पीडा, शिरकी पीडा, अङ्गोंका टूटना आदि विकारोंको शमन करता है। यदि सम्पूर्ण शरीरमें या किसी अङ्गविशेषमें पीडा हो तो उस स्थानमें वालुकास्वेद देना चाहिये। शीत, शूल, स्तब्धता, और शरीरकी पीडाके निवारण होजानेपर एवं स्रोतोंमें लघुता आजानेपर स्वेद बन्द करदेना चाहिये ॥ २४०-४३ ॥

आमज्वरे वातबलासजे वा कफोत्थिते मारुतसम्भवे वा।
त्रिदोषजे स्वेदमुदाहरन्ति स्तम्भप्रमोहाङ्गरुजाप्रशान्त्यै ॥४४॥

आमज्वर, वातकफज्वर, कफजज्वर, वातज और सन्निपातजज्वरमें स्वेद देनेसे स्तब्धता, मूर्च्छा और शरीरकी पीडा शान्त होती है ॥ ४४ ॥

पिप्पलीभिः शृतं तोयमनभिष्यन्दि दीपनम्।
वातश्लेष्मविकारघ्नं प्लीहज्वरविनाशनम् ॥ ४५ ॥

पीपलका क्वाथ पान करनेसे शरीरके स्रोत शुद्ध होते हैं, अग्नि दीपन होती है, वात और कफके रोग और प्लीहायुक्त ज्वर नष्ट होता है ॥ ४५ ॥