भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 78
४६भैषज्यरत्नावली ।[ चिकित्सा-

मुस्तनागरभूनिम्बन्रतयमेतत् त्रिकार्षिकम् ।
कफवातामशमनं पाचनं ज्वरनाशनम् ॥ ४६ ॥
नागरमोथा, सोंठ और चिरायता इन तीनोंको ३ कर्ष परिमाण लेकर क्वाथ बनाकर सेवन करनेसे कफ, वात और आमदोष शमन होता है। एवं दोषोंका परिपाक होता है और ज्वरका नाश होता है।

पञ्चकोल ।

पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ।
दीपनीयः शृतो वर्गः कफानिलगदापहः ॥ ४७ ॥
पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड और सोंठ इनके द्वारा बनाया हुआ क्वाथ-कफ और वातसे उत्पन्नहुए रोगोंको दूर करता है एवं अग्निको दीपन करता है ॥ ४७ ॥

निम्बादि ।

निम्बामृताविश्वदारुकट्फलं कटुका वचा ।
कषायं पाययेदाशु वातश्लेष्मज्वरापहम् ॥
पर्वभेदशिरःशूलकासारोचकपीडितम् ॥ ४८ ॥
नीमकी छाल, गिलोय, सोंठ, देवदारु, कायफल, कुटकी और वच इनका क्वाथ पान करनेसे वातश्लेष्मज्वर शीघ्र नष्ट होता है। एवं सन्धियोंकी पीडा, शिरका शूल, खाँसी, अरुचि आदि उपद्रव तत्काल दूर होते हैं ॥ ४८ ॥

क्षुद्रादि ।

क्षुद्रामृतानागरपुष्कराहैः कृतः कषायः कफमारुतोत्तरे ।
सश्वासकासारुचिपार्श्वरूग्ज्वरे ज्वरे त्रिदोषप्रभवेऽपि शस्यते ॥
कटेरी, गिलोय, सोंठ और पोहकरमूल इनका क्वाथ वातश्लेष्मज्वर, सन्निपातज्वर, श्वास खाँसी, अरुचि और पार्श्वशूलयुक्त ज्वरमें सेवन करना उपयोगी है ॥ ४९ ॥

दशमूलीकषाय ।

दशमूलीरसः पेयः कणायुक्तः कफानिले ।
अविपाकेऽतिनिद्रायां पार्श्वरुक्श्वासकासके ॥ २५० ॥
वात-कफज्वरमें यदि वातादिदोषोंका उत्तम प्रकारसे परिपाक न हुआ हो एवं निद्राकी अधिकता हो तथा पार्श्वशूल, श्वास और खाँसी हो तो दशमूलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर पान करना चाहिये ॥ २५० ॥