भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ४७
दार्वादि ।
दारुपर्पटभाङ्ग्यब्दवचाधान्यककट्फलैः ।
साभयाविश्वपूतीकैः क्वाथो हिंगुमधूत्कटैः ॥ ५१ ॥
कफवातज्वरे पीतो हिक्काशोषगलग्रहान् ।
श्वासकासप्रसेकांश्च हन्यात्तरुमिवाशनिः ॥ ५२ ॥
देवदारु, पित्तपापडा, भारंगी, नागरमोथा, वच, धनियाँ, कायफल, हरड, सोंठ और दुर्गन्धकरंजइनके क्वाथमें हींग और शहद मिलाकर पान करनेसे कफवात-ज्वर, हिचकी, शोष, गलेकी पीडा, श्वास, खाँसी और मुँहसे पानीका गिरना ये सब रोग इस प्रकार नष्ट होते हैं जैसे-वज्रपातसे वृक्ष तत्काल नष्ट हो जाते हैं ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
आरग्वधादि ।
आरग्वधग्रन्थिकमुस्ततिक्तहरीतकीभिः कथितः कषायः ।
सामे सशूले कफवातयुक्ते ज्वरे हितो दीपनपाचनश्च ॥ ५३ ॥
अमलतास, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी और हरड इनका क्वाथ आम और शूलयुक्त वातकफज्वरमें हितकारी है एवं अग्निप्रदीपक और पाचक है ॥ ५३ ॥
त्रिफलादिकषाय ।
त्रिफला त्रायमाणा च मृद्वीका कटुरोहिणी ।
वातश्लेष्म हरत्येष कषायो ह्यनुलोमिकः ॥ ५४ ॥
हरड, बहेडा, आमला, त्रायमाण, दाख और कुटकी इनका क्वाथ वातश्लेष्म-ज्वरको हरता है और वायुका अनुलोमन करता है ॥ ५४ ॥
मुस्तकादि ।
मुस्ता गुडूची सह नागरेण वासाजलं पर्पटकं च पथ्या ।
क्षुद्रा च दुःस्पर्शयुतः कषायः पाने हितो वातकफज्वरस्य ५५ ॥
नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, अडूसा, सुगन्धवाला, पित्तपापडा, हरड, कटेरी और धमासा इनका क्वाथ पान करनेसे वातश्लेष्मज्वर नाश होता है ॥ ५५ ॥
बृहत्पिप्पल्यादि क्वाथ ।
पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरम् ।
वचा सातिविषाऽजाजी पाठा वत्सकरेणुका ॥ ५६ ॥
किराततिक्तको मूर्वा सर्षपो मरिचानि च ।
कट्फलं पुष्करं भाङ्गीं विडङ्गं कर्कटाह्वयम् ॥ ५७ ॥