भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
यह अवलेह दारुण सन्निपात, हिचकी, श्वास, खाँसी और कण्ठके रोगोंको नष्ट करता है । ऊर्ध्वगत श्लेष्माको नष्ट करनेके लिये स्वेदादि उष्णक्रिया करनी होती है, उस समय उष्णताके विरोधी होनेके कारण शहदके बदले उक्त ओषधियोंके चूर्णको अदरखके रसमें मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । क्योंकि शहद और उष्णता दोनोंही परस्पर विशेष विरोधी हैं ॥ ७९-८१ ॥
अञ्जन ।
शिरीषबीजगोमूत्रकृष्णामरिचसैन्धवैः ।
अञ्जनं स्यात्प्रबोधाय सरसोनशिलावचैः ॥ ८२ ॥
शिरसके बीज, पीपल, काली मिरच, सेंधानमक, लहसुन, मैनसिल और वच इनको गोमूत्रमें पीसकर नेत्रोंमें आँजनेसे रोगी तत्काल होशमें हो जाता है -८२॥
असुराह्वपतङ्गस्य विट्चूर्णं मधुसंयुतम् ।
अञ्जनं बोधयेन्मुग्धं तन्द्रितं सन्निपातिनम् ॥ ८३ ॥
असुराह्वपतंग ( तेलियाकीड़ों ) की बीटको पीसकर शहदमें मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे मूर्च्छा और तन्द्रायुक्त सन्निपात रोगीको जल्दी चैतन्य हो जाता है ॥ ८३ ॥
दशमूल ।
बिल्वश्योनाकगाम्भारीपाटलागणकारिकाः ।
दीपनं कफवातघ्नं पञ्चमूलमिदं महत् ॥ ८४ ॥
शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहतीद्वयगोक्षुरम् ।
वातपित्तापहं वृष्यं कनीयः पञ्चमूलकम् ॥ ८५ ॥
उभयं दशमूलं हि सन्निपातज्वरापहम् ।
कासे श्वासे च तन्द्रायां पार्श्वशूले च शस्यते ।
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं कण्ठहृद्ग्रहनाशनम् ॥ ८६ ॥
बेल, शोनापाला ( अरलू ), कुम्हेर, पाढल और अरणी इन पाँचोंको बृहत् पञ्चमूल कहते हैं । यह अग्निप्रदीपक और वात-कफनाशक है । शालपर्णी पृष्ठपर्णी, बड़ी कटेरी, कटेरी और गोखरू इनको लघु पञ्चमूल कहते हैं । यह वातपित्तनाशक और वृष्य ( वीर्यवर्द्धक ) है । इन दोनों पञ्चमूलोंको दशमूल कहते हैं, इस दशमूलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण मिलाकर सेवन करनेसे सन्निपातज्वर, खाँसी, श्वास, तन्द्रा, पार्श्वशूल, कण्ठ और हृदयकी पीड़ा ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ८३-८६ ॥