भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ५३

द्वादशाङ्ग ।

दशमूलीकषायस्तु सपौष्करकणान्वितः ।
सन्निपाते ज्वरे देयः श्वासकाससमन्विते ॥ ८७ ॥

श्वास और खाँसी युक्त सन्निपातज्वर में दशमूल, पोहकरमूल और पीपलका क्वाथ अथवा दशमूलके क्वाथमें पोहकरमूल और पीपलका चूर्ण डालकर प्रयोग करना चाहिये ॥ ८७ ॥

चतुर्दशाङ्ग ।

चिरज्वरे वातकफोल्बणे वा त्रिदोषजे वा दशमूलमिश्रः ।
किराततिक्तादिगणःप्रयोज्यःशुद्ध्यर्थिने वा त्रिवृताविमिश्रः ८८

पुराने ज्वरमें अथवा वात-कफाधिक्य ज्वरमें या सन्निपातज्वरमें दशमूल और किराततिक्तादिगण (चिरायता, नागरमोथा, गिलोय और सोंठ) की औषधियोंका क्वाथ प्रयोग करना चाहिये, विरेचनकी आवश्यकता होनेपर रोगीको उक्त क्वाथमें निसोथका चूर्ण डालकर पान करना चाहिये ॥ ८८ ॥

अष्टादशाङ्ग ।

दशमूली शठी शृङ्गी पौष्करं सदुरालभम् ।
भार्ङ्गी कुटजबीजं च पटोलं कटुरोहिणी ॥ ८९ ॥
अष्टादशाङ्ग इत्येष सन्निपातज्वरापहः ।
कासहृद्ग्रहपाश्वार्त्तिश्वासहिक्कावमीहरः ॥ २९० ॥

दशमूल, कचूर, काकड़ासिंगी, पोहकरमूल, धमासा, भारंगी, इन्द्रजौ, परवल और कुटकी इनको अष्टादशाङ्ग कहते हैं। इसका क्वाथ पान करनेसे सन्निपातज्वर, खाँसी, हृदय और पसलीकी पीडा, श्वास, हिचकी और वमन ये सब रोग दूर होते हैं ॥ ८९–२९० ॥

भूनिम्बादि अष्टादशाङ्ग ।

भूनिम्बदारुदशमूलमहौषधाब्द-
तिक्तेन्द्रबीजधनि केभकणाकषायः ।
तन्द्राप्रलापकसनारुचिदाहमोह-
श्वासादियुक्तमखिलं ज्वरमाशु हन्ति ॥ ९१ ॥

चिरायता, देवदारु, दशमूल, सोंठ, नागरमोथा, कुटकी, इन्द्रजौ, धनियों और गजपीपल इनका बनाया हुआ क्वाथ तंद्रा, प्रलाप, खाँसी, अरुचि, दाह, मोह और श्वासादि समस्त उपद्रवोंसहित ज्वरको तत्काल नष्ट करता है ॥ ९१ ॥