भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८२० | भेषज्यरत्नावली । | [ गुल्मरोग- |
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यथाविधि घृतको सिद्ध करे। गुल्मरोगीको यह घृत शर्करा और सेंधानमक डालकर पान करनेसे विशेष उपकार करता है ॥ १६ ॥
द्राक्षाद्यघृत !
द्राक्षामधुकखर्जूरं विदारीं सशतावरीम् ।
परूषकाणि त्रिफलां साधयेत्पलसम्मिताम् ॥ १७ ॥
जलाढके पादशेषे रसमामलकस्य च ।
घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् ॥ १८ ॥
साधयेत्तु घृतं सिद्धं शर्कराक्षौद्रपादिकम् ।
प्रयोगात्पित्तगुल्मघ्नं सर्वपित्तविकारनुत् ॥ १९ ॥
“साहचर्यादिह पृथक् घृतादेः क्वाथतुल्यता ॥”
दाख, महुआ, खजूर, विदारीकन्द, शतावर, फालसे और त्रिफला ये प्रत्येक चार चार तोले लेकर आठ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते दो सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें आमलोंका रस २ सेर, घृत २ सेर, ईखका रस २ सेर, दूध २ सेर और हरड़का कल्क आधा सेर लेकर डालदेवे । सबोंको अच्छे प्रकार मिलाकर घृतको सिद्ध करे। जब सिद्ध होकर शीतल होजाय तब खाँड और शहद आध आध सेर मिलादेवे । इस घृतको सेवन करनेसे पित्तोत्पन्न गुल्म एवं अन्यान्य प्रकारके पित्तके सब विकार नाश होते हैं ॥ १७–१९ ॥
गुल्मरोगमें पथ्य ।
स्नेहः स्वेदो विरेकश्च वस्तिर्बाहुशिराव्यधः ।
लङ्घनं वर्त्तिरभ्यङ्गः स्नेहः पक्के तु पाटनम् ॥ १२० ॥
संवत्सरसमुत्पन्नाः कलाया रक्तशालयः ।
खडः कुलत्थयूषश्च धन्वमांसरसं सुरा ॥ २१ ॥
गवामजायाश्च पयो मृद्वीका च परूषकम् ।
खर्जूरं दाडिमं धात्री नागरङ्गाम्लवेतसम् ॥ २२ ॥
तक्रमैरण्डतैलं च लशुनं बालमुस्तकम् ।
पत्तूरो वास्तुकं शिग्रु यवक्षारो हरीतकी ॥ २३ ॥
रामठं मातुलुङ्गं च त्र्यूषणं सुरभीजलम् ।
यदन्नं स्निग्धमुष्णं च बृंहणं लघु दीपनम् ॥
वातानुलोमनं चैव पथ्यं गुल्मे नृणां भवेत् ॥ २४ ॥