भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२१
स्नेह ( घृत तैलादि ) पान, स्वेददेना, विरेचन ( जुल्लाब ), पिचकारी लगाना, बाहोंकी अधःस्थ शिराको वेदना, लंघन, गुदामें बत्ती चढ़ाना, तेलकी मालिश, स्निग्ध द्रव्योंका प्रयोग, पाटन ( पकनेपर नस्तरसे चीरना ), पुरानी मटर, शालिके चावल, खडयूष, कुलत्थीका यूष, धन्वदेशके जीवोंका मांसरस, मदिरा, गौका व बकरीका दूध, दाख, फालसे, खजूर, अनार, आमले, नारङ्गी, अमलवेत, मट्ठा, अण्डीका तेल, लहसन, कच्चीमूली, शान्तिशाक, बथुआ, सहिंजनेकी फली, जवा-खार, हरड़, हींग, बिजौरानींबू, सोंठ, मिरच, पीपल, गोमूत्र एवं स्निग्ध, गरम, पुष्टि-कर, हलका, अग्निवर्द्धक और वायुको अनुलोमन करनेवाला भोजन ये सब पदार्थ गुल्मरोगीको हितकारी हैं ॥ १२०-१२४ ॥
गुल्मरोगमें अपथ्य ।
वातकारीणि सर्वाणि विरुद्धान्यशनानि च ।
वल्लूरं मूलकं मत्स्यान्मधुराणि फलानि च ॥ १२५ ॥
शुष्कशाकं शमीधान्यं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
अधोवातशकृन्मूत्रश्रमश्वासाश्रुधारणम् ॥
वमनं जलपानं च गुल्मरोगी परित्यजेत् ॥ १२६ ॥
गुल्मरोगी वायुवर्द्धक समस्त पदार्थ, विरुद्ध भोजन, सूखामांस मूली, मछली, मीठे फल, सूखे शाक, समेके चावल, विष्टम्भकारक, भारी पदार्थ तथा अपानवायु, मल, मूत्र, परिश्रम, श्वास और आँसू इनके वेगको रोकना, वमन और जलपान करना सबको त्याग देवे, क्योंकि ये सब गुल्मरोगमें अपथ्य हैं ॥ १२५-१२६ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां गुल्मरोगचिकित्सा ।
हृद्रोगकी चिकित्सा ।
वातोपसृष्टे हृदये वामयेत्स्निग्धमातुरम् ।
द्विपञ्चमूलीक्वाथेन सस्नेहलवणेन च ॥ १ ॥
वातजन्य हृदयरोगमें—तैलादिके द्वारा स्निग्धशरीरंवाले रोगीको दशमूलके क्वाथमें घृत, लवण और मैनफलका चूर्ण डालकर वमन करावे ॥ १ ॥