भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२१


स्नेह ( घृत तैलादि ) पान, स्वेददेना, विरेचन ( जुल्लाब ), पिचकारी लगाना, बाहोंकी अधःस्थ शिराको वेदना, लंघन, गुदामें बत्ती चढ़ाना, तेलकी मालिश, स्निग्ध द्रव्योंका प्रयोग, पाटन ( पकनेपर नस्तरसे चीरना ), पुरानी मटर, शालिके चावल, खडयूष, कुलत्थीका यूष, धन्वदेशके जीवोंका मांसरस, मदिरा, गौका व बकरीका दूध, दाख, फालसे, खजूर, अनार, आमले, नारङ्गी, अमलवेत, मट्ठा, अण्डीका तेल, लहसन, कच्चीमूली, शान्तिशाक, बथुआ, सहिंजनेकी फली, जवा-खार, हरड़, हींग, बिजौरानींबू, सोंठ, मिरच, पीपल, गोमूत्र एवं स्निग्ध, गरम, पुष्टि-कर, हलका, अग्निवर्द्धक और वायुको अनुलोमन करनेवाला भोजन ये सब पदार्थ गुल्मरोगीको हितकारी हैं ॥ १२०-१२४ ॥

गुल्मरोगमें अपथ्य ।

वातकारीणि सर्वाणि विरुद्धान्यशनानि च ।
वल्लूरं मूलकं मत्स्यान्मधुराणि फलानि च ॥ १२५ ॥
शुष्कशाकं शमीधान्यं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
अधोवातशकृन्मूत्रश्रमश्वासाश्रुधारणम् ॥
वमनं जलपानं च गुल्मरोगी परित्यजेत् ॥ १२६ ॥

गुल्मरोगी वायुवर्द्धक समस्त पदार्थ, विरुद्ध भोजन, सूखामांस मूली, मछली, मीठे फल, सूखे शाक, समेके चावल, विष्टम्भकारक, भारी पदार्थ तथा अपानवायु, मल, मूत्र, परिश्रम, श्वास और आँसू इनके वेगको रोकना, वमन और जलपान करना सबको त्याग देवे, क्योंकि ये सब गुल्मरोगमें अपथ्य हैं ॥ १२५-१२६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां गुल्मरोगचिकित्सा ।


हृद्रोगकी चिकित्सा ।

वातोपसृष्टे हृदये वामयेत्स्निग्धमातुरम् ।
द्विपञ्चमूलीक्वाथेन सस्नेहलवणेन च ॥ १ ॥

वातजन्य हृदयरोगमें—तैलादिके द्वारा स्निग्धशरीरंवाले रोगीको दशमूलके क्वाथमें घृत, लवण और मैनफलका चूर्ण डालकर वमन करावे ॥ १ ॥

८२३भैषज्यरत्नावली ।[ हृद्रोग-

पिप्पत्येला वचा हिङ्गु यवक्षारोऽथ सैन्धवम् ।
सौवर्चलमथो शुण्ठी अजमोदा च चूर्णितम् ॥ २ ॥
फलधान्याम्लकौलत्थदधिमद्यासवादिभिः ।
पाययेच्छुद्धदेहं च स्नेहेनान्यतमेन वा ॥ ३ ॥

वमन विरेचनादिके द्वारा शुद्ध हुए रोगीको पीपल, इलायची, वच, हींग, जवाखार, सैंधानमक, कालानमक, सोंठ और अजमोद इन ओषधियोंके समान भाग चूर्णको एकत्र करके बिजौरेनीम्बूके रस, काँजी, कुलथीके यूष, दही, मद्य, आसव या अन्य घृतादि स्निग्ध पदार्थोंके साथ मिश्रितकर पान करावे ॥

नागरं वा पिबेदुष्णं कषायं चाग्निवर्द्धनम् ।
कासश्वासानिलहरं शूलहृद्रोगनाशनम् ॥ ४ ॥

सोंठके मन्दोष्ण क्वाथको पान करनेसे अग्नि बढ़ती है तथा खाँसी, श्वास, वायुविकार, शूल और हृदयरोग दूर होता है ॥ ४ ॥

श्रीपर्णीमधुकक्षौद्रसितागुडजलैर्वमेत् ।
पित्तोपसृष्टे हृदये सेवेत मधुरैः शृतम् ॥
घृतं कषायांश्चोद्दिष्टान् पित्तज्वरविनाशनान् ॥ ५ ॥

पित्तोत्पन्न हृदयरोगमें कुम्हेरके फल, मुलहठी इनके अर्द्धपक्व क्वाथमें शहद, मिश्री और गुड मिलाकर रोगीको पान कराकर वमन करावे । एवं मधुर पदार्थोंके साथ सिद्ध किया हुआ घी और पित्तज्वरनाशक क्वाथ सेवन करे ॥ ५ ॥

शीताः प्रदेहाः परिषेचनानि तथा विरेको हृदि पित्तदुष्टे ।
द्राक्षासिताक्षौद्रपरूषकैः स्याच्छुद्धे च पित्तापहमन्नपानम् ॥
पिष्ट्वा पिबेद्वापि सिताजलेन यष्ट्याह्वयं तिक्तकरोहिणीं च ॥ ६ ॥

पित्तज हृदयरोगमें चन्दनादि शीतल पदार्थोंका प्रलेप, शीतल जलका सेचन और विरेचनादि क्रिया करे । एवं वमन विरेचनादिसे शरीरकी शुद्धि हो जानेपर, दाख, मिश्री, शहद और फालसे इत्यादि द्रव्योंके साथ पित्तनाशक अन्न तथा पान सेवन करे । मुलहठी और कुटकीको जलमें पीसकर मिश्री डालकर पान करे तों पित्तका हृद्रोग दूर होता है ॥ ६ ॥

अर्जुनस्य त्वचा सिद्धं क्षीरं योज्यं हृदामये ।
सितया पञ्चमूल्या वा बलया मधुकेन वा ॥ ७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२३


अर्जुनवृक्षकी छाल २ तोले, दूध ८ तोले और जल ३२ तोले सबको एकत्र कर पकावे। जब ८ तोले जल शेष रहजाय तब शीतल होजानेपर उस दूधको मिश्री मिलाकर पीवे। इसी प्रकार पञ्चमूल, खिरेंटी या मुलहठीके क्वाथसे सिद्ध किये हुए दूधको चीनी डालकर पीवें तो पित्तज हृदयरोग दूर होय ॥ ७ ॥

घृतेनदुग्धेन गुडाम्भसा वा पिबन्ति चूर्णं ककुभत्वचो ये ।
हृद्रोगजीर्णज्वररक्तपित्तं हत्वा भवेयुश्चिरजीविनस्ते ॥ ८ ॥
जो हृदयरोगी घृत, दुग्ध अथवा गुडके शर्बतके साथ अर्जुनकी छालका चूर्ण सेवन करे तो वह हृदयरोग, जीर्णज्वर और रक्तपित्तरोगको नष्ट करके दीर्घजीवी होता है ॥ ८ ॥

वचानिम्बकषायाभ्यां वान्तं हृदि कफोत्थिते ।
वातहृद्रोगनुच्चूर्णं पिप्पल्यादिं च पाययेत् ॥ ९ ॥
कफजन्य हृदयरोगमें वच और नीमकी छालका क्वाथ पान कराकर वमन करावे। फिर वातजहृदयरोगको नष्ट करनेवाला पिप्पल्यादिगणका चूर्ण सेवन करे ॥ ९ ॥

त्रिदोषजे लंघनमादितः स्यादन्नं च सर्वेषु हितं विधेयम् ।
हीनातिमध्यत्वमवेक्ष्य चैव कार्यं त्रयाणामपि कर्म शस्तम् ॥
त्रिदोषजहृदयरोगमें पहले लंघन करावे, फिर त्रिदोषनाशक तथा हितकारी अन्न-पान देवे। इसमें तीनों दोषोंकी प्रबलता, समता अथवा हीनताको अच्छे प्रकार विचारकर चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १० ॥

चूर्णं पुष्करजं लिह्यान्माक्षिकेण समायुतम् ।
हृच्छूलश्वासकासघ्नं क्षयहिक्कानिवारणम् ॥ ११ ॥
पोहकरमूलके चूर्णको शहदमें मिलाकर चाटे तो हृदयशूल, श्वास, खाँसी, क्षय और हिचकी आदि रोग दूर होते हैं ॥ ११ ॥

तैलाज्यगुडविपक्वं चूर्णं गोधूमपार्थजं चापि ।
पिबति पयोऽनु च यः स भवेज्जितसकलहृदामयः पुरुषः १२ ॥
गेहूँ और अर्जुनकी छालके चूर्णको तेल, घी और गुडके द्वारा पकाकर दूधके साथ पीवे। इससे सर्वप्रकारका हृदयरोग नष्ट होता है ॥ १२ ॥

मूलं नागबलायास्तु चूर्णं दुग्धेन पाययेत् ।
हृद्रोगश्वासकासघ्नं ककुभस्य च वल्कलम् ॥ १३ ॥
रसायनं परं बल्यं वातजिन्मासयोजितम् ।
संवत्सरप्रयोगेण जीवेद्वर्षशतं ध्रुवम् ॥ १४ ॥

<!-- Page 856 (Illustration / Blank Page) -->
<!-- Page 857 (Illustration / Blank Page) -->
८२६भैषज्यरत्नावली ।[ शूलरोग-

छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् ।
हृद्रोगं सर्वशूलाशहृल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ २७ ॥
अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् ।
शोथोदराम्लपित्तं च विषमज्वरमेव च ॥
हन्त्यन्यानपि रोगांश्च बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥ २८ ॥
हजार पुटों द्वारा शुद्ध कीहुई वज्राभ्रकभस्मको अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें सात दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करके छायामें सुखाकर गोलियाँ बनालेवे । यह नागार्जुन नामकी अभ्रक हृदयरोग, सर्वप्रकारक शूल, अर्श, हृल्लास, वमन, अरुचि एवं अन्य नाना प्रकारकी व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करती है तथा बल्य, पुष्टिकर और रसायन है ॥ २६–२८ ॥

हृदयार्णवरस !

सूतार्कगन्धकं क्वाथे वराया मर्दयेद्दिनम् ।
काकमाच्या वटीं कृत्वा चणमात्रां च भक्षयेत् ।
हृदयार्णवनामाऽयं हृद्रोगदलनो रसः ॥ २९ ॥
शुद्ध पारा, ताँबा और शुद्ध गन्धक इनको समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथ और मकोयके रसमें एक दिनतक विधिपूर्वक खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । नित्यप्रति एक एक गोली सेवन करनेसे हृदयार्णवनामवाला यह रस हृदय रोगको नष्ट करताहै ॥ २९ ॥

पञ्चाननरस ।

सूतगन्धौ द्रवैर्धात्र्या मर्दयेद्गोस्तनीद्रवैः ।
यष्टिखर्जूरसलिलैर्दिनं च परिमर्दयेत् ॥
धात्रीचूर्णं सितां चानु पिबेद्धृद्रोगशान्तये ॥ ३० ॥
पारे और गन्धकको बराबर २ लेकर आमलोंके रसमें खरल करके दाख मुलहठी और खजूरके क्वाथमें एक दिनतक यथाविधि खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो दो रत्तीभर, आमलोंके चूर्ण और मिश्रीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे हृदयरोग शान्त होताहै ॥ ३० ॥

प्रभाकरवटी ।

माक्षिकं लोहमभ्रं च तुगाक्षीरं शिलाजतु ।
क्षिप्त्वा खल्लोदरे पश्चाद्भावयेत्पार्थवारिणा ॥ ३१ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२७

वल्लद्वयमितां कुर्याद्वटीं छायाविशोषिताम् ।
प्रभाकरवटी सेयं हृद्रोगान्निखिलाञ्जयेत् ॥ ३२ ॥

सोनामाखी, लोहेकी भस्म, अभ्रकभस्म, वंशलोचन और शिलाजीत ये सब औषधि समान भाग लेवे। सबको खरलमें रख अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथको डालकर अच्छे प्रकार खरल करे। फिर छायामें सुखाकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना-लैवे। यह प्रभाकरवटी यथानियम सेवन करनेसे समस्त हृदयसम्बन्धी रोगोंको दूर करती है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

चिन्तामणिरस ।

पारदं गन्धकं चाभ्रं लौहं वङ्गं शिलाजतु ।
समं समं गृहीत्वा च स्वर्णं सूताङ्घ्रिसम्मितम् ॥ ३३॥
स्वर्णस्य द्विगुणं रौप्यं सर्वमेकत्र मर्दयेत् ।
चित्रकस्य द्रवेणापि भृङ्गराजाम्भसा ततः ॥ ३४ ॥
पार्थस्याथ कषायेण सप्तकृत्वो विभावयेत् ।
ततो गुञ्जामिताः कुर्याद्वटीश्छायाप्रशोषिताः ।
एकैकां दापयेदासां गोधूमक्वाथवारिणा ॥ ३५ ॥

शुद्ध पारा, गन्धक, अभ्रक, लोहा, वङ्ग और शिलाजीत ये प्रत्येक एक एक तौला एवं सुवर्णभस्म तीन मासे, चाँदीके भस्म ६ मासे लेवे, सबको एकत्रकर चीता, भाँगरा और अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें ७ बार खरल करके छायामें सुखा-कर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःसमय एक एक गोली गेहूँके क्वाथके साथ सेवन करे ॥ ३४-३६ ॥

हृद्रोगान्निखिलान् हन्ति व्याधीन् फुफ्फुसजानपि ।
प्रमेहान्विंशतिं श्वासान् कासानपि सुदुस्तरान् ॥ ३६ ॥
बलपुष्टिकरो हृद्यो रसश्चिन्तामणिः स्मृतः ॥ ३७ ॥

यह चिन्तामणि रस सम्पूर्ण हृदयरोग, फुफ्फुसजन्यरोग, बीस प्रकारके प्रमेह, श्वास, दुस्तर खाँसी, अन्य सर्वप्रकारके रोगोंको, तत्काल नष्ट करता है एवं बल और पुष्टिकारक तथा हृदयको अत्यन्त हितकारी है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥

विश्वेश्वररस ।

स्वर्णाभ्रलोहवङ्गानां रसगन्धकयोरपि ।
वैक्रान्तस्य च संगृह्य भागांस्तोलकसम्मितान् ॥ ३८ ॥

८२८भैषज्यरत्नावली ।[ हृद्रोग •

कर्पूरसलिलेनाथ भावयित्वा यथाविधि ।
रक्तिकैकप्रमाणेण विदध्याद्वटिकास्ततः ॥ ३९ ॥
अयं विश्वेश्वरो नाम रसः फुप्फुसजान् गदान् ।
हृद्रोगांश्च जयेत्सर्वान् संशयोऽत्र न विद्यते ॥ ४० ॥

सोना, अभ्रक, लोहा, वङ्ग, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और वैक्रान्तमणि इन सब द्रव्योंकी भस्मको एक एक तोला लेकर कपूरके जलमें विधिपूर्वक खरल करके एक एक रत्ती की गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन नियमानुसार सेवन करनेसे यह विश्वेश्वर-नामक रस फुप्फुससे उत्पन्न हुए रोगों और समस्त हृदयरोगोंको शीघ्र जीतता है । इसमें कुछ सन्देह नहीं है ॥ ३८-४० ॥

शङ्करवटी ।

रसस्य भागाश्चत्वारो बलेरष्टौ तथा मताः ।
त्रयो लौहस्य नागस्य द्वावित्येकत्र मर्दयेत् ॥ ४१ ॥
भावयेत्काकमाच्याश्च चित्रकस्यार्द्रकस्य च ।
स्वरसेन जयन्त्याश्च वासाया बिल्वपार्थयोः ॥ ४२ ॥
ततो गुञ्जाद्वयमितां विदध्याद्वटिकां भिषक् ।
एकैकां दापयेदासामीषदूष्णेन वारिणा ॥ ४३ ॥

शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले, लोहा ३ तोले और शीशा दो तोले इन सबको एकत्रितकर मकोय, चीता, अदरख, जयन्ती, अडूसा, बेलकी छाल और अर्जुनवृक्षकी छालके क्वाथमें यथाक्रम भावना देकर अच्छी तरह खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे हररोज एक एक गोली सुखोष्ण जलके साथ सेवन करे ॥ ४१–४३ ॥

जयेदियं फुप्फुसजान् रोगान् हृदयसम्भवान् ।
जीर्णज्वरं तथा घोरं प्रमेहानपि विंशतिम् ॥ ४४ ॥
कासश्वासामवातांश्च ग्रहणीमपि दुस्तराम् ।
वटी श्रीशङ्करप्रोक्ता बलपुष्टिविवर्द्धिनी ॥ ४५ ॥

यह वटी फुप्फुसजन्यरोग, हृदयगतरोग, पुराना ज्वर, बीसों प्रमेह, खाँसी, श्वास, आमवात और दुस्तर संग्रहणी आदि रोगोंको तत्काल नष्ट करती है । यह वटी श्रीशङ्कर भगवान्ने की है । यह अतिबलकारक और पुष्टिकर है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८२९

कल्याणसुन्दररस ।

सिन्दूरमभ्रं तारं च ताम्रं हेम च हिङ्गुलम् ।
सर्वं खल्वतले क्षिप्त्वा मर्दयेद्वह्निवारिणा ॥ ४६ ॥
हस्तिशुण्डाम्भसा पश्चाद्भावयित्वा च सप्तधा ।
गुञ्जामात्रां वटीं कृत्वा कोष्णतोयेन दापयेत् ॥ ४७ ॥
उरस्तोयं च हृद्रोगं वक्षोवातमुरोऽस्रकम् ।
फुफ्फुसान्हन्ति रोगांश्च रसः कल्याणसुन्दरः ॥ ४८ ॥

रससिन्दूर, अभ्रक, चाँदी, ताँबा, सोना और हिंगुल इन सबको समान भाग लेकर खरलमें रक्खे, फिर उसमें चीतेका क्वाथ डालकर घोटे। पश्चात् हाथीशुण्डीके क्वाथकी सात बार भावना देकर उत्तम प्रकारसे घोटे। तदनन्तर एक एक रत्तीकी गोली बनाकर रखले। प्रतिदिन मन्दोष्ण जलके साथ एक एक गोली भक्षण करे तो उरस्तोय, हृदयरोग, वक्षःस्थलकी वात, उरोरक्तस्राव तथा फुफ्फुससम्बन्धी अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ४६-४८ ॥

वल्लभघृत ।

मुख्यं शतार्द्धं च हरीतकीनां सौवर्चलस्यापि पलद्वयं च ।
पक्वं घृतं वल्लभकेति नाम्ना हृद्रोगशूलोदरमारुतघ्नम् ॥ ४९ ॥

बीजरहित उत्तम हरड ५० और कालानमक ८ तोले इन दोनोंके साथ पकाये हुए घृतको पान करनेसे हृदयरोग, शूल, उदररोग और वातरोग दूर होते हैं। यह वल्लभनामसे प्रसिद्ध है ॥ ४९ ॥

श्वदंष्ट्राद्यघृत ।

श्वदंष्ट्रोशीरमञ्जिष्ठा बला काश्मर्यकत्तृणम् ।
दर्भमूलं पृथक्पर्णी पलाशर्षभकौ स्थिरा ॥ ५० ॥
पलिकान्साधयेत्तेषां रसे क्षीरे चतुर्गुणे ।
कल्हैः स्वगुप्तर्षभकमेदाजीवन्तिजीवकैः ॥ ५१ ॥
शतावर्युद्धिर्माद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसैः ।
प्रस्थं सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्रोगशूलनुत् ॥ ५२ ॥
मूत्रकृच्छ्रप्रमेहार्शःश्वासकासक्षयापहः ।
धनुःस्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नानां बलमांसदः ॥ ५३ ॥

गोखुरू, खस, मंजीठ, खिरेंटी, कुम्मेर, सुगन्धित तृण, कुशाकी मूल, पृश्निपर्णी, ढालकी छाल, ऋषभक और शालपर्णी इनको पृथक् पृथक् चार चार तोले लेकर

<!-- Page 862 (Illustration / Blank Page) -->
<!-- Page 863 (Illustration / Blank Page) -->

८३२ भैषज्यरत्नावली । [ मूत्रकृच्छ्र- ]


पित्तजनित मूत्रकृच्छ्रमें रोगीके शरीरपर जल छिड़कना, शीतलजलमें घुसकर स्नान करना, चन्दन, खसादि शीतल पदार्थोंका प्रलेप, ग्रीष्मकालके अनुसार शीतल उपचार करना, पिचकारी लगाना, दुग्धपान, विरेचन ( जुलाब ) देना और दाख, विदारीकन्द तथा ईखके रसके साथ घृतपान करना इत्यादि सब कृत्य करने चाहिये २

क्षारोष्णतीक्ष्णौषधमन्नपानं स्वेदो यवान्नं वमनं निरूहाः ।
तक्रं सतिक्तौषधसिद्धतैलमभ्यङ्गपानं कफमूत्रकृच्छ्रे ॥ ३ ॥

कफजन्यमूत्रकृच्छ्रमें क्षार, गरम तथा तीक्ष्ण औषधि, अन्नपान, पसीना निकलवाना, जौके आटेका बना भोजन, वमन, निरूहवस्ति, मट्ठा, कडुवी और उष्ण औषधियोंसे पकाये हुए तेलकी मालिश अथवा पान करावे ॥ ३ ॥

सर्वं त्रिदोषप्रभवे च वायोः स्थानानुपूर्व्या प्रसमीक्ष्य
कार्यम् । त्रिभ्योऽधिके प्राग्वमनं कफे स्यात्पित्ते विरेकः
पवने च वस्तिः ॥ ४ ॥

तीनों दोषोंसे उत्पन्न मूत्रकृच्छ्रमें वायुके स्थानसे लेकर कफपर्यन्त जो विधि कही हैं उन सबोंको मिलकर इसमें चिकित्सा करे । विशेष करके दोषोंकी अवस्थाको देखकर मिश्रित उपचार करे । त्रिदोषज मूत्रकृच्छ्रमें कफकी अधिकता होनेपर वमन, पित्ताधिक्यमें विरेचन, वातकी आधिक्यमें वस्ति देवे ॥ ४ ॥

तथाऽभिघातजे कुर्यात्सद्यो व्रणचिकित्सितम् ।
मूत्रकृच्छ्रे सदा कार्या वातरोगहरी क्रिया ॥
स्वेदचूर्णक्रियाभ्यङ्गवस्तयः स्युः पुरीषजे ॥ ५ ॥

चोट आदिके लगनेसे प्रगटहुए मूत्रकृच्छ्रमें शीघ्रही व्रणरोगकी समान समस्त वातजमूत्रकृच्छ्रनाशक चिकित्सा करे । मलके रोकनेसे जो मूत्रकृच्छ्र उत्पन्न हुआ होय तो स्वेद प्रयोग, या विरेचन औषधियोंका चूर्ण नलीमें भरकर गुदामें प्रवेश करना, तैलादिकी मालिश अथवा वस्तिकर्म करे ॥ ५ ॥

क्रिया हिता त्वश्मरीशर्करायां या मूत्रकृच्छ्रे कफमारुतोत्थे ।

वायु और कफसे जो मूत्रकृच्छ्र हुआ हो तो अश्मरी तथा शर्करारोगमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करे ॥

लेह्यं शुक्रविबन्धोत्थे शिलाजतु समाक्षिकम् ।
वृष्यैर्बृंहितधातोश्च विधेया प्रमदोत्तमा ॥ ६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८३३

वीर्यके रोकनेसे प्रादुर्भूत मूत्रकृच्छ्रमें शिलाजीतको शहदके साथ मिलाकर चाटें अथवा पुष्टिकारक औषधियोंको सेवन करनेसे वीर्यके बढनेके कारण उत्पन्न हुए मूत्रकृच्छ्रमें सुन्दर स्त्रीके साथ प्रसंग करे ॥ ६ ॥

यन्मूत्रकृच्छ्रे विहितं च पैत्ते तत्कारयेच्छोणितमूत्रकृच्छ्रे ।

रुधिरसहित मूत्र आनेवाले मूत्रकृच्छ्रमें पित्तज मूत्रकृच्छ्रमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करे ।

कूष्माण्डकरसं पीत्वा सयवक्षारशर्करम् ।
मूत्रकृच्छाद्विमुच्येत शीघ्रं च लभते सुखम् ।

पेठेके रसको जवाखार और मिश्री मिलाकर पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग शीघ्र दूर होकर आनन्द प्राप्त होता है ॥ ७ ॥

गुडेनामलकं वृष्यं श्रमघ्नं तर्पणं परम् ।
पित्तासृग्दाहशूलघ्नं मूत्रकृच्छ्रनिवारणम् ॥ ८ ॥

गुडके साथ आंमलोंका चूर्ण सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि, श्रमनाश, अत्यन्त तृप्ति एवं रक्तपित्त, दाह, शूल और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥

एर्वारुबीजं मधुकं च दार्वीं पैत्ते पिबेत्तण्डुलधावनेन ।
दार्वीं तथैवामलकीरसेन समाक्षिकां पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रे ॥ ९ ॥

पैत्तिक मूत्रकृच्छ्रमें ककडीके बीज, मुलहठी और दारुहल्दी इनके चूर्णको चावलोंके जलके साथ पान करे अथवा आमलोंके रसमें दारुहल्दीका चूर्ण और शहद डालकर पीनेसे पित्तज मूत्रकृच्छ्र नष्ट होता है ॥ ९ ॥

सितातुल्यो यवक्षारः सर्वकृच्छ्रविनाशनः ।

जवाखार और मिश्री समान भाग मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके मूत्रकृच्छ्र नाश होते हैं ॥

सूर्यावर्त्तभवं बीजं श्लक्ष्णं दृषदि पेषितम् ।
व्युषितोदकसंीतं कृच्छ्रं हन्ति सुदारुणम् ॥ १० ॥

हुलहुलके बीजोंको शिलापर खूब बारीक पीसकर बासी जलके साथ पीनेसे दारुण मूत्रकृच्छ्र नष्ट होता है ॥ १० ॥

मधुना च यवक्षारं मूत्रकृच्छ्राश्मरीहरम् ।

शहद जवाखार एकत्र मिलाकर सेवन करे तो मूत्रकृच्छ्र एवं अश्मरी जाय ॥

५३

८३४ | भैषज्यरत्नावली । | [ मूत्रकृच्छ्र

सगन्धकं यवक्षारं शर्करातक्रतः पिबेत् । मूत्रकृच्छ्राद्विमुच्येत साध्यासाध्यान्न संशयः ॥ ११ ॥ शुद्ध गन्धक, जवाखार और चीनी इनको समान भाग ले मट्ठेमें मिलाकर पीवे तो साध्य व असाध्य सर्वप्रकारका मूत्रकृच्छ्र निश्चय दूर होता है ॥ ११ ॥

नारिकेलोद्भवं पुष्पं तण्डुलोदकसंयुतम् । सरक्तं मूत्रकृच्छ्रं हि पीतं हन्ति न संशयः ॥ १२ ॥ नारियलके फूलोंके जलके साथ पीसकर सेवन करनेसे रक्तसहित होनेवाला मूत्रकृच्छ्र निस्सन्देह दूर होता है ॥ १२ ॥

क्वाथं गोक्षुरबीजस्य यवक्षारयुतं पिबेत् । मूत्रकृच्छ्रं तथा रक्तं पीतं शीघ्रं निवारयेत् ॥ १३ ॥ गोखुरूके बीजोंके क्वाथमें जवाखारका चूर्ण मिश्रितकर पीवे तो मूत्रकृच्छ्र आर रक्तस्राव तत्काल नष्ट होते हैं ॥ १३ ॥

विदारी गोक्षुरं यष्टी केशरं च समं पचेत् । तत्कषायं पिबेत्क्षौद्ररसभस्मयुतं पुनः ॥ मूत्रकृच्छ्रं हरेत्सर्वं सप्ताहात्पित्तसम्भवम् ॥ १४ ॥ विदारीकन्द, गोखुरू, मुलहठी और नागकेशर इनको समान भागसे मिश्रित कर पकावे । फिर उस क्वाथमें शहद तथा पारदभस्म डालकर पान करे तो सात दिनमेंही पित्तजन्य मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ १४ ॥

तृणपञ्चमूल ।

कुशः काशः शरो दर्भ इक्षुश्चेति तृणोद्भवम् । पित्तकृच्छ्रहरं पञ्चमूलं वस्तिविशोधनम् ॥ १५ ॥ तृणपञ्चमूल (कुशा, कांस, रामशर, डाभ और ईख) की जडको औटाकर पान करनेसे पित्तज मूत्रकृच्छ्र दूर होता है तथा वस्ति शुद्ध होती है ॥ १५ ॥

पञ्चतृणक्षीर ।

एतत्सिद्धं पयः पीतं मेढ्रगं हन्ति शोणितम् । तृणपञ्चमूलके क्वाथसे सिद्ध कियेहुए दूधका पीनेसे लिंगद्वारा रक्तस्राव होना बन्द होता है ॥

त्रिकण्टकादि ।

त्रिकण्टकारग्वधदर्भकाशदुरालभाप्रस्तरभेदपथ्याः । निघ्नन्ति पीडां मधुनाऽश्मरीं च सम्प्राप्तमृत्योरपि मूत्रकृच्छ्रम् ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८३५

गोखुरू, अमलतास, डाभ, काँस, धमासा, पाषाणभेद, और हरड इनको समान भाग लेकर कूट पीसकर चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करे तो अश्मरी और मृत्युके समान प्राप्त हुई मूत्रकृच्छ्रकी पीडा नष्ट होती है ॥ १६ ॥

धात्र्यादि ।

धात्री द्राक्षा विदारी च यष्ट्याह्वं गोक्षुरं तथा ।
एभिः कषायं विपचेत्पिबेच्छीतं सशर्करम् ॥
अपि योगशतासाध्यं मूत्रकृच्छ्रं जयेल्लघु ॥ १७ ॥

आमला, दाख, विदारीकन्द, मुलहठी और गोखुरू इनका काढा बनाकर शीतल होनेपर मिश्री डालकर पीवे । जो सैकडों योगोंसे भी असाध्य हो ऐसे मूत्रकृच्छ्रको यह छोटासा प्रयोग नष्ट कर देता है ॥ १७ ॥

बृहद्धात्र्यादि ।

धात्री द्राक्षा च यष्ट्याह्वं विदारी सत्रिकण्टका ।
दर्भैक्षुमूलमभया क्वाथयित्वा जलं पिबेत् ॥
ससितं मूत्रकृच्छ्रघ्नं रुजं दाहहरं परम् ॥ १८ ॥

आमला, दाख, मुलहठी, विदारीकन्द, गोखुरू, डाभ, ईखकी मूल और हरड इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर मिश्री डालकर पीनेसे अत्यन्त दाहयुक्त मूत्रकृच्छ्र-रोग शमन होता है ॥ १८ ॥

अमृतादि ।

अमृता नागरं धात्री वाजिगन्धा त्रिकण्टकम् ।
प्रपिबेद्वातरोगार्त्तः सशूलो मूत्रकृच्छ्रवान् ॥ १९ ॥

गिलोय, सोंठ, आमले, असगन्ध और गोखुरू इनके क्वाथको पान करनेसे शूलसहित मूत्रकृच्छ्ररोग व वातरोग शान्त होता है ॥ १९ ॥

शतावर्यादि ।

शतावरी काशकुशश्वदंष्ट्राविदारिशालीक्षुकशेरुकाणाम् ।
क्वाथं सुशीतं मधुशर्कराक्तं पिबञ्जयेत्पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रम् ॥ २०॥

शतावर, काँस, कुशा, गोखुरू, विदारीकन्द, शालिके चावल, ईखकी जड और कसेरू इनके क्वाथको विधिपूर्वक बनावे । जब शीतल होजाय तब शहद और चीनी मिलाकर पीवे । इससे पित्तसे हुआ मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ २० ॥

८३६ भेषज्यरत्नावली । [ मूत्रकृच्छ्र-

हरीतक्यादि ।

हरीतकीगोक्षुरराजवृक्षपाषाणभिद्विल्वयवासकानाम् ।
क्वाथं पिबेन्माक्षिकसंप्रयुक्तं कृच्छ्रे सदाहे सरुजे विबन्धे २१॥
हरड, गोखुरू, अमलतांस, पाषाणभेद, बेलगिरी और धमासा इनके क्वाथमें शहद मिलाकर सेवन करे तो दाहयुक्त मूत्रकृच्छ्र और विबन्धरोग नष्ट होता है ॥

तारकेश्वररस ।

शुद्धसूतं समं गन्धं लौहं वङ्गं मृताभ्रकम् ।
दुरालभां यवक्षारं बीजं गोक्षुरजं शिवाम् ॥ २२ ॥
समांशं कारयेत्सर्वं कूष्माण्डफलवारिणा ।
पञ्चतृणभवक्वाथे रसे गोक्षुरजे तथा ॥ २३ ॥
संपिष्य वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः ।
मधुनाऽऽमर्द्य विलिहेन्मूत्रकृच्छ्रविनाशनः ॥ २४ ॥
उडुम्बरफलं पक्वं चूर्णितं कर्षमात्रकम् ।
लेहयेन्मधुना सार्द्धमनुपानं सुखावहम् ॥
अजाक्षीरं भवेत्पथ्यं शर्करेशुरसो हितः ॥ २५ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, वङ्ग और अभ्रक इनकी भस्म, धमासा, जवाखार, गोखुरूके बीज और हरड ये प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसले, फिर इस चूर्णको पेठेके रस, तृणपञ्चमूलके क्वाथ और गोखुरूके क्वाथमें क्रमपूर्वक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली शहदमें मिलाकर सेवन करे अथवा पकेहुए गूलरके फलोंके दो तोले चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है । इसपर बकरीका दूध, चीनी और ईखका रस पथ्य है ॥ २२-२५ ॥

त्रिनेत्राख्यरस ।

वङ्गं सूतं गन्धकं भावयित्वा लौहे पात्रे मर्दयेदेकवासरम् ।
दूर्वायष्टीगोक्षुरैः शाल्मलीभिर्मूषामध्ये भूधरे पाचवित्वा ॥ २६ ॥
तत्तद्भावैर्भावयित्वाऽस्य वल्लं दद्याच्छीतं पायसं वक्ष्यमाणम् ।
दूर्वायष्टीशाल्मलीतोयदुग्धैस्तुल्यैः कुर्यात् पायसं तद्ददीत ॥
प्रातःकाले शीतपानीयपानाज्जाते मूत्रे सुखिनं तं करोति ॥ २७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८३७

वङ्ग, पारा और गन्धक इनको समान भाग लेकर लोहेके पात्रमें रख दूर्वा, मुल- हठी, गोखुरू और शेमलकी जड इनके क्वाथसे अच्छे प्रकार खरल करे । फिर मूषायन्त्रमें रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । जब शीतल होजाय तब इसको निकालकर उपर्युक्त औषधियोंके क्वाथमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । तद- न्तर दूब, मुलहठी और शेमलकी जडका क्वाथ एवं दूध ये सब बराबर बराबर लेकर खीर बनावे । नित्यप्रति एक एक गोली इसी खीरके साथ खाय । प्रातःसमय औषधि सेवन करके शीतल जल पीनेसे जब पेशाब होगा तब रोगी सुखी होगा । यह मूत्रकृच्छ्रको नष्ट करनेके लिये उत्तम है ॥ २६ ॥ २७ ॥

मूत्रकृच्छ्रान्तकरस १-२ ।

शतावरीरसैः पिष्ट्वा मृतसूतं च तालकम् ।
शिखिचुत्थं च तुल्यांशं दिनैकं मर्दयेद्दृढम् ॥ २८ ॥
तद्गोलं सार्षपे तैले पाच्यं यामं च चूर्णयेत् ।
मूत्रकृच्छ्रान्तकश्चास्य क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ २९ ॥
भक्षणान्नात्र सन्देहो मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्यलम् ।
तुलसीतिलपिण्याकं बिल्वमूलं तुषाम्बुना ॥
कर्षैकं वाऽनुपानेन सुरया वा सुवर्चलैः ॥ ३० ॥

१—पारेकी भस्म, हरताल और शुद्ध नीलाथोथा इनको समान भाग लेवे । फिर सबको शतावरके रसमें एक दिनतक उत्तम प्रकार खरल करके गोलासा बनालेवे । इस गोलेको सरसोंके तेलमें एक प्रहरतक पकावे और शीतल होजानेपर चूर्ण करलेवे । इस प्रकार यह मूत्रकृच्छ्रान्तक रस सिद्ध होता है। इसको नित्यप्रति प्रातःकाल चार चार रत्ती प्रमाण शहदमें मिलाकर खानेसे निस्सन्देह समस्त मूत्रकृच्छ्र नष्ट होते हैं । अनुपान—तुलसीका रस, तिलकी खल और बेलकी जडके क्वाथको तुषाम्बुनामवाली काँजीमें अथवा मदिरामें हुलहुलका रस मिलाकर एकएक कर्षकी मात्रासे पान करे ॥ २८–३० ॥

सूतं स्वर्णं च वैक्रान्तं गन्धतुल्यं विमर्दयेत् ।
चण्डाली-राक्षसीद्रावैर्द्वियामान्ते तुगोलकम् ॥ ३१ ॥
शुष्कं बद्ध्वा पुटेच्चाह्नः करीषाग्नौ महापुटे ।
माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैर्मूत्रकृच्छ्रप्रशान्तये ॥ ३२ ॥

८३८भैषज्यरत्नावली ।[ मूत्रकृच्छ्र-

२-शुद्ध पारा, गन्धक, सुवर्ण और वैक्रान्तमणि सबको बराबर २ लेकर लिंगिनीलता और चोरनामक गन्धद्रव्य ( भटेडर ) के रसमें दो प्रहरतक विधिपूर्वक खरल करके गोलासा बनालेवे । फिर इस गोलेको सुखालेवे और महापुटमें स्थापनकर सन्धिस्थानोंको बन्द करके उपलोंकी अग्निमें एक दिनतक पुट देवे । जब शीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे प्रतिदिन एकएक माशा, शहदमें मिलाकर चाटे तो मूत्रकृच्छ्र शान्त होता है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

शतावरीघृत और क्षीर ।

शतावरीकाशकुशश्वदंष्ट्राविदारिकेक्ष्वामलकेषु सिद्धम् ।
सर्पिःपयो वा सितया विमिश्रं कृच्छ्रेषु पित्तप्रभवेषु योज्यम् ३३

शतावर, काँस, कुश, गोखुरू, विदारीकन्द, ईख और आमले इनके क्वाथमें सिद्ध कियाहुआ घृत अथवा दूध मिश्री डालकर पान करे तो पित्तज मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ ३३ ॥

त्रिकण्टकाद्य घृत ।

त्रिकण्टकैरण्डकुशाद्यभीरुकर्कारुकेक्षुस्वरसेन सिद्धम् ।
सर्पिर्गुडाद्धर्द्धांशयुतं प्रपेयं कृच्छ्राश्मरीमूत्रविघातहेतोः ॥३४॥

गोखुरू, अण्डकी जड, कुशादि पञ्चमूल, शतावर, पेठा और ईख इनके स्वरस ( अभावमें क्वाथ ) से सिद्ध कियाहुआ घी और घीसे आधा भाग गुड मिलाकर पीवै । इस घृतके सेवन करनेसे मूत्रकृच्छ्र, पथरी और मूत्राघात रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ ३४ ॥

मूत्रकृच्छ्रमें पथ्य ।

पुरातना लोहितशालयश्च क्षारो यवान्नानि च तीक्ष्णमुष्णम् ।
तक्रं पयो दध्यपि गोप्रसूतं धन्वामिषं मुद्गरसाः सिता च ॥ ३५ ॥
पुराणकूष्माण्डफलं पटोलं महार्द्रकं गोक्षुरकं कुमारी ।
गुवाकखर्जूरकनारिकेलतालद्रुमाणां च शिरांसि पथ्या ॥ ३६ ॥
तालास्थिमज्जा त्रपुषं त्रुटिश्च शीतानि पानान्यशनानि चापि ।
प्रणीरनीरं हिमवालुका च हितं नृणां स्यात्प्रतिमूत्रकृच्छ्रे ॥३७॥

पुराने लाल शालिके चावल, जवाखार आदि खार द्रव्य, जौका भोजन, तीक्ष्ण और गरम पदार्थ, मठा, गौका दूध, दही, मरुदेशके जीवोंका मांस

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८५९


रस, मूँगका यूष, मिश्री, पुराना पेठा, परवल, वन अदरक, गोखुरू, घींग्वार, सुपारी, खजूर, नारियल, ताडके वृक्षोंकी गिरी, हरड, ताडके फलोंका गूदा, खीरा, छोटी इलायची, शीतल अन्न पान, शीतल जल और कपूर ये सब वस्तुयें मूत्रकृच्छ्र-रोगमें हितकारी हैं ॥ ३५–३७ ॥

मूत्रकृच्छ्रमें अपथ्य ।

मद्यं श्रमं निधुवनं गजवाजियानं सर्वं विरुद्धमशनं
विषमाशनं च । ताम्बूलमत्स्यलवणार्द्रकतैलभृष्टंपिण्या-
कहिङ्गुतिलसर्षपवेगराधान् ॥ माषान् करीरमतितीक्ष्ण-
विदाहिरूक्षमम्लं तु मुञ्चतु जनः सति मूत्रकृच्छ्रे ॥ ३८ ॥

मूत्रकृच्छ्ररोग होनेपर रोगी मद्यपान, परिश्रम, मैथुन, हाथी या घोडेकी सवारी, सर्वप्रकारके विरुद्ध भोजन, विषम भोजन, ताम्बूलचर्वण, मछली, लवण, अदरक, तैलके भुने द्रव्योंका भक्षण, खल, हींग, तिल, सरसोंका सेवन, मल मूत्रादिके वेगको रोकना, उडद, बाँसके कल्ले, अत्यन्त तीक्ष्ण-दाहकारी, रूखे और अम्लरस-युक्त पदार्थोंको तत्काल त्याग देवे ॥ ३८ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा ॥


मूत्राघातकी चिकित्सा

मूत्राघातान् यथादोषं मूत्रकृच्छ्रहरैर्जयेत् ।
वस्तिमुत्तरवस्तिं च दद्यात्स्निग्धविरेचनम् ॥ १ ॥

मूत्राघातमें वातादिदोषोंको विचारकर, मूत्रकृच्छ्रनाशक औषधियोंसे विधिपूर्वक चिकित्सा करे एवं वस्ति और उत्तरवस्तिका प्रयोग तथा रोगीको स्निग्ध कर विरेचन देवे ॥ १ ॥

कल्कमेर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम् ।
धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्राघाताद्विमुच्यते ॥ २ ॥

ककडीके बीजोंके २ तोले कल्क और सेंधानमकको काँजीमें मिलाकर पीते ही मूत्राघातरोग नष्ट होता है ॥ २ ॥

यवक्षारं गुडोन्मिश्रं पिबेत्पुष्पफलोद्भवम् ।
रसं मूत्रविबन्धघ्नं शर्कराश्मरिनाशनम् ॥ ३ ॥

८४० भेषज्यरत्नावली । [मूत्राघात-

पेठेके स्वरसमें जवाखार और पुराना गुड मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघात, शर्करा और अश्मरीरोग नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥

सपत्रफलमूलस्य क्वाथं गोक्षुरकस्य च । पिबेन्मधुसितायुक्तं मूत्राघातादिरोगनुत् ॥ ४ ॥ पत्र, फल और जडसहित गोखरूके क्वाथको बनाकर शहद और मिश्री मिलाकर पीवे तो मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र और अश्मरीरोग दूर होते हैं ॥ ४ ॥

नलकुशकाशेक्षुशिफां क्वथितां प्रातः सुशीतलां ससिताम् । पिबतः प्रयाति नियतं मूत्रग्रह इत्युवाच कचः ॥ ५ ॥ नल, कुश, काँस और ईखकी जड इनका क्वाथ बनालेवे । शीतल होनेपर इसको मिश्री डालकर प्रातःकाल पीनेसे मूत्राघात निश्चय दूर होता है, ऐसा कचऋषिने कहा है ॥ ५ ॥

बिम्बीमूलं च संपिष्टं काञ्जिकेन समन्वितम् । नाभिलेपनमात्रेण मूत्ररोधं निहन्ति च ॥ ६ ॥ कन्दूरीकी जडको काँजीमें पीसकर नाभिके ऊपर लेप करनेसे मूत्राघात रोग दूर होता है ॥ ६ ॥

मूत्रे विबन्धे कर्पूरचूर्णं लिंगे प्रवेशयेत् । कूष्माण्डकरसो वापि पेयः सक्षारशर्करः ॥ ७ ॥ मूत्राघात होनेपर कपूरके बारीक पिसे चूर्णको लिङ्गके छिद्रमें प्रवेश करे अथवा पेठेके रसको जवाखार और खांड डालकर पीवे तो इससे पेशाब खुलकर आता है ॥ ७ ॥

जलेन खदिरीबीजं मूत्राघाताश्मरीहरम् । मूलं रुद्रजटायाश्च तक्रपीतं तदर्थकृत् ॥ ८ ॥ खैरीशाकके बीजोंको जलमें पीसकर एवं रुद्रजटाकी जडको मट्ठेके साथ पीसकर पान करे तो मूत्राघात और अश्मरीरोग दूर होते हैं ॥ ८ ॥

श्रुतशीतपयोऽन्नाशी चन्दनं तण्डुलाम्बुना । पिबेत्सर्करं श्रेष्ठमुष्णवातविनाशनम् ॥ ९ ॥ लाल चन्दनको चावलोंके जलमें घिसकर उसमें मिश्री डालकर पीवे । पश्चात् औटाकर शीतल किये हुए दूधके साथ भोजन करे तो उष्णवात (मूत्राघात विशेष) रोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥