भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 872, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 872

८४० भेषज्यरत्नावली । [मूत्राघात-

पेठेके स्वरसमें जवाखार और पुराना गुड मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघात, शर्करा और अश्मरीरोग नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥

सपत्रफलमूलस्य क्वाथं गोक्षुरकस्य च । पिबेन्मधुसितायुक्तं मूत्राघातादिरोगनुत् ॥ ४ ॥ पत्र, फल और जडसहित गोखरूके क्वाथको बनाकर शहद और मिश्री मिलाकर पीवे तो मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र और अश्मरीरोग दूर होते हैं ॥ ४ ॥

नलकुशकाशेक्षुशिफां क्वथितां प्रातः सुशीतलां ससिताम् । पिबतः प्रयाति नियतं मूत्रग्रह इत्युवाच कचः ॥ ५ ॥ नल, कुश, काँस और ईखकी जड इनका क्वाथ बनालेवे । शीतल होनेपर इसको मिश्री डालकर प्रातःकाल पीनेसे मूत्राघात निश्चय दूर होता है, ऐसा कचऋषिने कहा है ॥ ५ ॥

बिम्बीमूलं च संपिष्टं काञ्जिकेन समन्वितम् । नाभिलेपनमात्रेण मूत्ररोधं निहन्ति च ॥ ६ ॥ कन्दूरीकी जडको काँजीमें पीसकर नाभिके ऊपर लेप करनेसे मूत्राघात रोग दूर होता है ॥ ६ ॥

मूत्रे विबन्धे कर्पूरचूर्णं लिंगे प्रवेशयेत् । कूष्माण्डकरसो वापि पेयः सक्षारशर्करः ॥ ७ ॥ मूत्राघात होनेपर कपूरके बारीक पिसे चूर्णको लिङ्गके छिद्रमें प्रवेश करे अथवा पेठेके रसको जवाखार और खांड डालकर पीवे तो इससे पेशाब खुलकर आता है ॥ ७ ॥

जलेन खदिरीबीजं मूत्राघाताश्मरीहरम् । मूलं रुद्रजटायाश्च तक्रपीतं तदर्थकृत् ॥ ८ ॥ खैरीशाकके बीजोंको जलमें पीसकर एवं रुद्रजटाकी जडको मट्ठेके साथ पीसकर पान करे तो मूत्राघात और अश्मरीरोग दूर होते हैं ॥ ८ ॥

श्रुतशीतपयोऽन्नाशी चन्दनं तण्डुलाम्बुना । पिबेत्सर्करं श्रेष्ठमुष्णवातविनाशनम् ॥ ९ ॥ लाल चन्दनको चावलोंके जलमें घिसकर उसमें मिश्री डालकर पीवे । पश्चात् औटाकर शीतल किये हुए दूधके साथ भोजन करे तो उष्णवात (मूत्राघात विशेष) रोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥

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