भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८४१
गोधावत्या मूलं कथितं घृततैलगोरसोन्मिश्रम् ।
पीतं निरुद्धमचिराद्दिनत्ति मूत्रस्य संरोधम् ॥ १० ॥
गोधापदी (कालीमुसली) की जडका क्वाथ बनाकर उसमें घृत, तेल और गौका दूध डालकर पीनेसे बहुत पुराना मूत्राघातरोग शीघ्र नष्ट भ्रष्ट होता है ॥ १० ॥
धान्याम्ललवणोपेतं सूतं यश्च पिबेन्नरः ।
तस्य नश्यन्ति वेगेन मूत्राघातास्त्रयोदश ॥ ११ ॥
काँजी और सेंधेनमकमें शुद्ध पारेको मिलाकर पीवे तो तेरह प्रकारके मूत्राघातरोग तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥
धान्यगोक्षुरकघृत ।
धान्यगोक्षुरकक्वाथकल्कयुक्तं घृतं हितम् ।
मूत्राघाते मूत्रदोषे शुक्रदोषे च दारुणे ॥ १२ ॥
धनियाँ दो सेर और गोखरू दो सेर इन दोनोंको १६ सेर जलमें औटावे । जब पकते पकते चार सेर जल बाकी रहे तब उतारकर छानलेवे फिर इस क्वाथमें घृत २ सेर और धनियाँ तथा गोखुरूका कल्क सोलह सोलह सेर डालकर यथाविधि घृत को सिद्ध करे । यह घृत मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र और दारुण वीर्यदोष में विशेष हितकर है ॥ १२॥
मूत्राघातमें पथ्य ।
अभ्यञ्जनस्नेहविरेकवस्तिस्वेदावगाहोत्तरवस्तयश्च ।
पुरातना लोहितशालयश्च मांसानि धन्वप्रभवानि मद्यम् १३॥
तक्रं पयो दध्यपि माषयूषः पुराणकूष्माण्डफलं पटोलम् ।
महार्द्रकं तालफलास्थिमज्जा हरीतकी कोमलनालिकेरम् १४॥
गुवाकखर्जूरकनालिकेलतालद्रुमाणामपि मस्तकानि ।
यथामलं सर्वमिदं च मूत्राघातातूराणां हितमावहन्ति ॥ १५॥
मूत्राघातवाले रोगियोंको तेल मलना, स्नेह (घृतादि) का पान, विरेचन और वस्तिक्रिया, स्वेद देना, शीतल जलमें घुसकर स्नान, उत्तरवस्ति प्रयोग पुराने लाल शालिके चावल, धन्वदेशोत्पन्न पशु पक्षियोंके मांसका रस, उडदका यूष, मदिरा, मट्ठा, गौका दूध, दही, पुराना पेठा, परवल, वन अदरक, ताडके फलोंकी गुठलीकी मींग, हरड, कच्चा नारियल, सुपारी, खजूर, नारियल और ताडके वृक्षों के अंकुर ये सब पदार्थ हितकारी हैं ॥ १३–१५ ॥