भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८५९
रस, मूँगका यूष, मिश्री, पुराना पेठा, परवल, वन अदरक, गोखुरू, घींग्वार, सुपारी, खजूर, नारियल, ताडके वृक्षोंकी गिरी, हरड, ताडके फलोंका गूदा, खीरा, छोटी इलायची, शीतल अन्न पान, शीतल जल और कपूर ये सब वस्तुयें मूत्रकृच्छ्र-रोगमें हितकारी हैं ॥ ३५–३७ ॥
मूत्रकृच्छ्रमें अपथ्य ।
मद्यं श्रमं निधुवनं गजवाजियानं सर्वं विरुद्धमशनं
विषमाशनं च । ताम्बूलमत्स्यलवणार्द्रकतैलभृष्टंपिण्या-
कहिङ्गुतिलसर्षपवेगराधान् ॥ माषान् करीरमतितीक्ष्ण-
विदाहिरूक्षमम्लं तु मुञ्चतु जनः सति मूत्रकृच्छ्रे ॥ ३८ ॥
मूत्रकृच्छ्ररोग होनेपर रोगी मद्यपान, परिश्रम, मैथुन, हाथी या घोडेकी सवारी, सर्वप्रकारके विरुद्ध भोजन, विषम भोजन, ताम्बूलचर्वण, मछली, लवण, अदरक, तैलके भुने द्रव्योंका भक्षण, खल, हींग, तिल, सरसोंका सेवन, मल मूत्रादिके वेगको रोकना, उडद, बाँसके कल्ले, अत्यन्त तीक्ष्ण-दाहकारी, रूखे और अम्लरस-युक्त पदार्थोंको तत्काल त्याग देवे ॥ ३८ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा ॥
मूत्राघातकी चिकित्सा
मूत्राघातान् यथादोषं मूत्रकृच्छ्रहरैर्जयेत् ।
वस्तिमुत्तरवस्तिं च दद्यात्स्निग्धविरेचनम् ॥ १ ॥
मूत्राघातमें वातादिदोषोंको विचारकर, मूत्रकृच्छ्रनाशक औषधियोंसे विधिपूर्वक चिकित्सा करे एवं वस्ति और उत्तरवस्तिका प्रयोग तथा रोगीको स्निग्ध कर विरेचन देवे ॥ १ ॥
कल्कमेर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम् ।
धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्राघाताद्विमुच्यते ॥ २ ॥
ककडीके बीजोंके २ तोले कल्क और सेंधानमकको काँजीमें मिलाकर पीते ही मूत्राघातरोग नष्ट होता है ॥ २ ॥
यवक्षारं गुडोन्मिश्रं पिबेत्पुष्पफलोद्भवम् ।
रसं मूत्रविबन्धघ्नं शर्कराश्मरिनाशनम् ॥ ३ ॥