भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८३३
वीर्यके रोकनेसे प्रादुर्भूत मूत्रकृच्छ्रमें शिलाजीतको शहदके साथ मिलाकर चाटें अथवा पुष्टिकारक औषधियोंको सेवन करनेसे वीर्यके बढनेके कारण उत्पन्न हुए मूत्रकृच्छ्रमें सुन्दर स्त्रीके साथ प्रसंग करे ॥ ६ ॥
यन्मूत्रकृच्छ्रे विहितं च पैत्ते तत्कारयेच्छोणितमूत्रकृच्छ्रे ।
रुधिरसहित मूत्र आनेवाले मूत्रकृच्छ्रमें पित्तज मूत्रकृच्छ्रमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करे ।
कूष्माण्डकरसं पीत्वा सयवक्षारशर्करम् ।
मूत्रकृच्छाद्विमुच्येत शीघ्रं च लभते सुखम् ।
पेठेके रसको जवाखार और मिश्री मिलाकर पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग शीघ्र दूर होकर आनन्द प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
गुडेनामलकं वृष्यं श्रमघ्नं तर्पणं परम् ।
पित्तासृग्दाहशूलघ्नं मूत्रकृच्छ्रनिवारणम् ॥ ८ ॥
गुडके साथ आंमलोंका चूर्ण सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि, श्रमनाश, अत्यन्त तृप्ति एवं रक्तपित्त, दाह, शूल और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥
एर्वारुबीजं मधुकं च दार्वीं पैत्ते पिबेत्तण्डुलधावनेन ।
दार्वीं तथैवामलकीरसेन समाक्षिकां पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रे ॥ ९ ॥
पैत्तिक मूत्रकृच्छ्रमें ककडीके बीज, मुलहठी और दारुहल्दी इनके चूर्णको चावलोंके जलके साथ पान करे अथवा आमलोंके रसमें दारुहल्दीका चूर्ण और शहद डालकर पीनेसे पित्तज मूत्रकृच्छ्र नष्ट होता है ॥ ९ ॥
सितातुल्यो यवक्षारः सर्वकृच्छ्रविनाशनः ।
जवाखार और मिश्री समान भाग मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके मूत्रकृच्छ्र नाश होते हैं ॥
सूर्यावर्त्तभवं बीजं श्लक्ष्णं दृषदि पेषितम् ।
व्युषितोदकसंीतं कृच्छ्रं हन्ति सुदारुणम् ॥ १० ॥
हुलहुलके बीजोंको शिलापर खूब बारीक पीसकर बासी जलके साथ पीनेसे दारुण मूत्रकृच्छ्र नष्ट होता है ॥ १० ॥
मधुना च यवक्षारं मूत्रकृच्छ्राश्मरीहरम् ।
शहद जवाखार एकत्र मिलाकर सेवन करे तो मूत्रकृच्छ्र एवं अश्मरी जाय ॥
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