भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 864

८३२ भैषज्यरत्नावली । [ मूत्रकृच्छ्र- ]


पित्तजनित मूत्रकृच्छ्रमें रोगीके शरीरपर जल छिड़कना, शीतलजलमें घुसकर स्नान करना, चन्दन, खसादि शीतल पदार्थोंका प्रलेप, ग्रीष्मकालके अनुसार शीतल उपचार करना, पिचकारी लगाना, दुग्धपान, विरेचन ( जुलाब ) देना और दाख, विदारीकन्द तथा ईखके रसके साथ घृतपान करना इत्यादि सब कृत्य करने चाहिये २

क्षारोष्णतीक्ष्णौषधमन्नपानं स्वेदो यवान्नं वमनं निरूहाः ।
तक्रं सतिक्तौषधसिद्धतैलमभ्यङ्गपानं कफमूत्रकृच्छ्रे ॥ ३ ॥

कफजन्यमूत्रकृच्छ्रमें क्षार, गरम तथा तीक्ष्ण औषधि, अन्नपान, पसीना निकलवाना, जौके आटेका बना भोजन, वमन, निरूहवस्ति, मट्ठा, कडुवी और उष्ण औषधियोंसे पकाये हुए तेलकी मालिश अथवा पान करावे ॥ ३ ॥

सर्वं त्रिदोषप्रभवे च वायोः स्थानानुपूर्व्या प्रसमीक्ष्य
कार्यम् । त्रिभ्योऽधिके प्राग्वमनं कफे स्यात्पित्ते विरेकः
पवने च वस्तिः ॥ ४ ॥

तीनों दोषोंसे उत्पन्न मूत्रकृच्छ्रमें वायुके स्थानसे लेकर कफपर्यन्त जो विधि कही हैं उन सबोंको मिलकर इसमें चिकित्सा करे । विशेष करके दोषोंकी अवस्थाको देखकर मिश्रित उपचार करे । त्रिदोषज मूत्रकृच्छ्रमें कफकी अधिकता होनेपर वमन, पित्ताधिक्यमें विरेचन, वातकी आधिक्यमें वस्ति देवे ॥ ४ ॥

तथाऽभिघातजे कुर्यात्सद्यो व्रणचिकित्सितम् ।
मूत्रकृच्छ्रे सदा कार्या वातरोगहरी क्रिया ॥
स्वेदचूर्णक्रियाभ्यङ्गवस्तयः स्युः पुरीषजे ॥ ५ ॥

चोट आदिके लगनेसे प्रगटहुए मूत्रकृच्छ्रमें शीघ्रही व्रणरोगकी समान समस्त वातजमूत्रकृच्छ्रनाशक चिकित्सा करे । मलके रोकनेसे जो मूत्रकृच्छ्र उत्पन्न हुआ होय तो स्वेद प्रयोग, या विरेचन औषधियोंका चूर्ण नलीमें भरकर गुदामें प्रवेश करना, तैलादिकी मालिश अथवा वस्तिकर्म करे ॥ ५ ॥

क्रिया हिता त्वश्मरीशर्करायां या मूत्रकृच्छ्रे कफमारुतोत्थे ।

वायु और कफसे जो मूत्रकृच्छ्र हुआ हो तो अश्मरी तथा शर्करारोगमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करे ॥

लेह्यं शुक्रविबन्धोत्थे शिलाजतु समाक्षिकम् ।
वृष्यैर्बृंहितधातोश्च विधेया प्रमदोत्तमा ॥ ६ ॥