भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 878

८४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अश्मरी-

-अथ नित्यं लिह्यात्पलोन्मितम् ॥ २२ ॥
खादेद्बलाग्निं संप्रेक्ष्य पथ्यं सेवेत मानवः ।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च मूत्राघातो विबन्धता ॥ २३ ॥
प्रमेहं विंशतिं चैव शुक्रदोषस्तथैव च ।
धातुक्षयश्चोष्णवातो वातकुण्डलिकायः ॥ २४ ॥
ते सर्वे प्रशमं यान्ति भास्करेण तमो यथा ।
नातः परतरं किञ्चित्कृष्णात्रेयेण पूजितः ॥ २५ ॥

तदनन्तर नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर ईश्वरस्मरण करके इसमेंसे चार चार तोले परिमाण अथवा अपनी अग्निके बलाबलको विचारकर भक्षण करे । इसपर हल्का और हितकारी भोजन करे । इसके सेवन करनेसे पथरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, विबन्ध, बीस प्रकारके प्रमेह, वीर्यदोष, धातुक्षीणता, उष्णवात और वातकुण्डलिकाम्रभृति सम्पूर्ण रोग इसप्रकार नाश होते हैं, जैसे सूर्यकी प्रभासे अन्धकार तत्काल नष्ट होजाता है। उक्त रोगोंको नष्ट करनेके लिये इससे श्रेष्ठ और कोई औषधि नहीं है । इसको कृष्णात्रेय मुनिने निर्माण किया है ॥ २२-२५ ॥

पाषाणभिन्न ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं शिलाजतु रसात्पलम् ।
श्वेतपुनर्नवावासारसैः श्वेतापराजितैः ॥ २६ ॥
प्रतिदिनं त्र्यहं मर्द्य शुष्कं तद्भाण्डसम्पुटे ।
स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे संशुष्कं तं विचूर्णयेत् ॥ २७ ॥
रसः पाषाणभिन्नः स्याद्दिगुञ्श्चाश्मरीं हरेत ।
भूधात्रीफलविशालां पिष्ट्वा दुग्धेन पाययेत् ॥
कुलत्थक्वाथसंपीतमनुपानं सुखावहम् ॥ २८ ॥

शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले और शिलाजीत ४ तोले इनको एकत्रकर सफेद पुनर्नवा, अडूसेके पत्तों और सफेद अपराजिताके पत्तोंके रसमें एक एक दिन अच्छे प्रकार खरल करके सुखालेवे । फिर मिट्टीके चिकने बर्तनमें रख मुख बन्द करके दोलायन्त्रसे स्वेद देवें । पश्चात् उसको निकालकर उत्तम प्रकारसे सुखाकर खूब बारीक पीसलेवे । इस प्रकार यह पाषाणभिन्ननामक रस सिद्ध होता है । इसकी प्रतिदिन प्रातःसमय दो दो रत्ती मात्राको ले भुईंआंवला और इन्द्रायणके फलोंको दूधमें पीसकर इसमें मिलालेवे अथवा कुलथीके