भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८४७
क्वाथमें मिलाकर सेवन करनेसे अश्मरीरोग शीघ्र नष्ट होता है और रोगी आनन्द होजाता है ॥ २६–२८ ॥
पाषाणवज्ररस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं रसैः श्वेतपुनर्नवैः ।
मर्द्दयित्वा दिनं खल्ले रुद्ध्वा तद्भूधरे पचेत् ॥ २९ ॥
दिनान्ते तत्समुद्धृत्य मर्दयेद् गुडसंयुतम् ।
अश्मरीं वस्तिशूलं च हन्ति पाषाणवज्रकः ॥ ३० ॥
गोरक्षकर्कटीमुलं क्वाथं कौलत्थकं तथा ।
अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३१ ॥
शुद्ध पारा एक भाग और गन्धक दो भाग इन दोनोंको सफेद पुनर्नवेके रसमें एकदिन खरलकर सम्पुटमें स्थापन करके भूधरयन्त्रमें पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर शीतल होजाय तब सायंकालमें इसको निकालकर गुड मिलाकर पुनः खरल कर लेवे । इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह पाषाणवज्र नामवाला रस गोरखककडीकी जडके. और कुलथीके क्वाथके साथ मिलाकर तथा वातादि दोषोंके बलाबलको विचारकर सेवन करनेसे पथरी और बस्तिशूल रोगको नष्ट करता है ॥ २९–३१ ॥
वरुणाद्यलौह ।
द्विपलं वरुणं धात्र्यास्तदर्द्धं धात्रिपुष्पकम् ।
हरीतक्याः पलार्द्धं च पृश्निपर्णी तदर्द्धकम् ॥ ३२ ॥
कर्षमानं च लौहाभ्रं चूर्णमेकत्र कारयेत् ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शाणमानं विधानवित् ॥ ३३ ॥
मूत्राघातं तथा घोरं मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ।
अश्मरीं विनिहन्त्याशु प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ३४ ॥
बलपुष्टिकरं चैव वृष्यमायुष्यमेव च ।
वरुणाद्यमिदं लौहं चरकेण विनिर्म्मितम् ॥ ३५ ॥
बरनाकी मींग ८ तोले, आमले ८ तोले, धायके फूल ४ तोले, हरड दो तोले, पृश्निपर्णी एक तोला, लोहे और अभ्रककी भस्म एक एक कर्ष लेवे । सबको एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन प्रातःकाल उठ-कर चार चार माशेकी मात्रासे सेवन करे । इसके सेवनसे घोर मूत्राघात, दारुण