भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 880
८४८भैषज्यरत्नावली ।[ अश्मरी-

मूत्रकृच्छ्र, पथरी, प्रमेह और विषमज्वर इत्यादि विकार अल्पकालमें शमन होते हैं तथा बल, वीर्य और आयु बढ़ती है एवं शरीरकी पुष्टि होती है। इस वरुणाद्य लोहको चरकमहाराजने निर्माण किया है ॥ ३२–३५ ॥

कुलत्थाद्यघृत ।

कुलत्थसिन्धूत्थविडङ्गसारसं सशर्करं शीतलि यावशूकम् ।
बीजानि कूष्माण्डकगोक्षुराणां घृतं पचेत्तद्वरुणस्य तोये॥३६॥
दुःसाध्यसर्वाश्मरिमूत्रकृच्छ्रं सूत्राभिघातं च समूत्रबन्धम् ।
एतानि सर्वाणि निहन्ति शीघ्रं प्ररूढवृक्षानिव वज्रपातः ३७

कुलथी, सैंधानमक, वायविडङ्गके चावल, खाँड, शीतलि (शीतलीलता), जवाखार, पेठेके और गोखुरूके बीज ये प्रत्येक चार चार तोले लेवे और सबको एकत्र कूट पीसकर कल्क बनालेवे। फिर चतुर्थांशावशिष्ट बनाये हुए वरनाके क्वाथमें इस कल्कको और गौके घृतको डालकर उत्तम रीतिसे पकावे ! इस घृतको नियमबद्ध हो सेवन करनेसे दुःसाध्य पथरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात और मूत्रावरोधादि सर्वप्रकारके मूत्ररोग इस प्रकार नष्ट होते हैं, जैसे कि अत्यन्त मजबूत जडवाले वृक्षोंको वज्र तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥

वरुणघृत ।

वरुणंस्य तुलां क्षुण्णां जलद्रोणे विपाचयेत ।
पादशेषं परिस्राव्य घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ३८ ॥
वरुणं कदली बिल्वं तृणजं पञ्चमूलकम् ।
अमृता चाश्मजं देयं बीजं च त्रपुषोद्भवम् ॥ ३९ ॥
शतपर्वा तिलक्षारं पलाशक्षारमेव च ।
यूथिकायाश्च मूलानि कार्षिकाणि समावपेत् ॥ ४० ॥

बरनाकी छाल १०० पल लेकर कूटके, फिर उसको ३२ सेर जलमें पकावे । पकते २ जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । इस क्वाथमें गौका घी १ प्रस्थ एवं वरनाकी छाल, केलेकी जड, बेलकी छाल, तृणपञ्चमूल, गिलोय, शुद्ध शिलाजीत, खीरेके बीज, ईखकी जड, तिलोंका खार, ढाकका क्षार और जुहीकी जड; ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले बारीक पीसकर डालेवे और मन्दमन्द अग्निके द्वारा शनैः शनैः घृतको सिद्ध करे ॥