भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६९


सालसारादिलेह ।

सालसारादिवर्गस्य क्वाथे तु घनतां गते ।
दन्तीलोध्रशिवाकान्तलौहताम्ररजः क्षिपेत् ॥
घनीभूतमदग्धं च प्राश्य मेहान्व्यपोहति ॥ २७ ॥

सालसारादिगणकी समस्त औषधियोंको चौगुने जलमें पकावे और चतुर्भाग जल अवशिष्ट रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर दोबारा इस क्वाथको पकावे और पकते २ जब अवलेहकी भाँति गाढ़ा पडजाय तब चूल्हेसे नीचे उतारकर उसमें दन्तीमूल, लोध, हरड, कान्तलोहभस्म और अभ्रकभस्म इन औषधियोंका एकत्र मिलाहुआ चूर्ण सालसारादिवर्गकी औषधियोंके चतुर्थांशकी बराबर लेकर डालदेवे । जब अच्छे प्रकार पककर शीतल होजाय तब नियमानुसार इसका सेवन करे । इससे सर्वप्रकारके प्रमेह दूर होते हैं ॥ २७ ॥


वङ्गावलेह ।

वङ्गस्य भस्म द्विपलं लेहयेन्मधुना सह ।
ततो गुडसमं गन्धं भक्षयेत्कर्षमात्रकम् ॥ २८ ॥
गुडूचीसत्त्वमथवा शर्करासहितं तथा ।
सर्वमेहहरो ज्ञेयो वङ्गावलेह उत्तमः ॥ २९ ॥

वंगभस्म ८ तोले लेकर शहदमें मिलाकर चाटे । पश्चात् शुद्ध गन्धक और गुड एक एक तोला परिमाण एकत्र मिश्रित कर सेवन करे अथवा गिलोयके सत्त्वको खांडके साथ भक्षण करे तो यह वंगावलेह सर्वप्रकारके प्रमेहोंको नष्ट करता है ॥ २८ ॥ २९ ॥


विडंगादि लौह ।

विडङ्गत्रिफलामुस्तैः कणया नागरेण च ।
जीरकाभ्यां युतो हन्ति प्रमेहानतिदारुणान् ।
लौहो मूत्रविकारांश्च सर्वानैव विनाशयेत् ॥ ३० ॥

वायविडंग, त्रिफला, नागरमोथा, पीपल, सोंठ, जीरा और कालाजीरा इन सबको समान भाग ले एकत्र चूर्ण करलेवे और सब चूर्णकी बराबर भाग लोहभस्म मिलाकर खूब बारीक पीसलेवे । इसके सेवनसे समस्त दारुण प्रमेह और अन्यान्य सम्पूर्ण मूत्रविकार नाश होते हैं ॥ ३० ॥


मेहकालानलरस ।

भस्मसूतं मृतं वङ्गं तुल्यं क्षौद्रेण मर्दयेत् ।