भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८६० | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह- |
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द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं मेहं हन्ति चिरोत्थितम् ॥
गुञ्जामूलं पिबेच्चानु क्षीरैरेव प्रशाम्यति ॥ ३१ ॥
शुद्ध पारेकी भस्म और वङ्गभस्म पृथक् २ एक एक तोला लेकर शहदके साथ खरल करलेवे। इसमेंसे प्रतिदिनं प्रातःकाल दो रत्तीभर भक्षण करे और ऊपरसे गुञ्जा (लताविशेष) की जडको पीसकर दूधमें मिलाकर पीवे तो बहुत दिनोंका पुराना प्रमेह शमन होता है ॥ ३१ ॥
पञ्चाननरस।
सूतं गन्धं मृतं लौहं मृतमभ्रं समांशिकम् ।
सर्वेषां द्विगुणं वङ्गं मधुना मर्दयेद्दिनम् ॥ ३२ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शीततोयं पिबेदनु ।
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति मूत्राघातं तथाऽश्मरीम् ॥
मूत्रकृच्छ्रं हरेदुग्रमयं पञ्चाननो रसः ॥ ३३ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहभस्म और अभ्रकभस्म ये सब समान भाग और सबसे दुगुनी वङ्गभस्म लेकर एकदिनतक शहदमें यथाविधि खरल करे। फिर इसको नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर दो दो रत्तीप्रमाण खाय और ऊपरसे शीतल जल पान करे। यह पञ्चानन रस बीसों प्रकारके प्रमेह, मूत्राघात, अश्मरी और अत्युग्र मूत्रकृच्छ्ररोगको नष्ट करता है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
चन्द्रकला।
सूताभ्रवङ्गायसभस्म सर्वमेतत्समानं परिभावयेत्तु ।
गुडूचिकाशाल्मलिकाकषायैर्निष्कार्द्धमानां मधुना ततश्च ।
बद्धा गुडीं चन्द्रकलेतिसंज्ञां मेहेषु सर्वेषु नियोजयेच्च ॥३४॥
रससिन्दूर, अभ्रक, वङ्ग और लोहभस्म इन सबको समान भाग लेकर गिलोय और सेमलकी जडके काथमें भावना देवे। पश्चात् मधुके सहयोगसे खरल करके एक एक तोलेकी गोलियाँ बनालेवे। चन्द्रकलानामवाला यह रस सर्वप्रकारके प्रमेहोंमें प्रयोग करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ३४ ॥
मेहमुद्गरवटिका।
रसाञ्जनं विडं दारु बिल्वगोक्षुरदाडिमम् ।
प्रत्येकं तोलकं देयं लौहचूर्णं तु तत्समम् ॥ ३५ ॥
पलैकं गुग्गुलुं दत्त्वा घृतेन वटिकां कुरु ।
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ३६ ॥