भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६१

मूत्रकृच्छ्रं तथा पाण्डुं धातुस्थं च ज्वरं जयेत् ।
हलीमकं रक्तपित्तं वातपित्तकफोद्भवम् ॥ ३७ ॥
ग्रहणीमामदोषं च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ।
एतान्सर्वाञ्जिहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३८ ॥

रसौंत, बिडनमक, देवदारु, बेलगिरी, गोखरूके बीज और पका हुआ अनार ये प्रत्येक एक एक तोला और इनके समस्त चूर्णकी बराबर लोहभस्म तथा गूगल ४ तोले लेवे। पुनः सबको एकत्र कूटपीसकर घृतके द्वारा खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ प्रस्तुत करे। तदनन्तर प्रत्यह प्रातःसमय एक एक गोली भक्षण करे तो साध्य व असाध्य बीसों प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पाण्डु, धातुगत ज्वर, हलीमक, रक्तपित्त, वातज, पित्तज, कफजन्यरोग, संग्रहणी, आमवात, मन्दाग्नि और अरुचि ये सब रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ ३५-३८ ॥

शुक्रमातृकावटी ।

गोक्षुरबीजं त्रिफला पत्रमेला रसाञ्जनम् ।
धान्यकं चविका जीरं तालीशं टङ्कदाडिमौ ॥ ३९ ॥
प्रत्येकार्द्धपलं दत्त्वा गुग्गुलोः कर्षमेव च ।
रसाभ्रगन्धलौहानां प्रत्येकं च पलं क्षिपेत् ॥ ४० ॥
सर्वमेकीकृतं वैद्यो दण्डयोगेन मर्दयेत् ।
घृतभाण्डे तु संस्थाप्य माषमेकं च भक्षयेत् ॥ ४१ ॥
अनुपानं प्रदातव्यं जातिभेदात्पृथक् पृथक् ।
दाडिमस्य रसेनैव च्छागदुग्धेन वाऽम्भसा ॥ ४२ ॥

गोखरूके बीज, त्रिफला, तेजपात, इलायची, रसौंत, धनियाँ, चव्य, जीरा, तालीसपत्र, सुहागा और अनारदाना ये हर एक औषधि दो दो तोले, गूगल १ तोला, शुद्ध पारा ४ तोले, अभ्रक ४ तोले, शुद्ध गन्धक ४ तोले तथा लोहभस्म ४ तोले लेवे। सबको एकत्र करके जल डालकर लोहेके दण्डेसे अच्छे प्रकार खरल करे। फिर घीके चिकने बासनमें भरकर रख देवे। इसमेंसे हररोज प्रातःकाल एक एक माशा खावे। इसपर अनारका रस, बकरीका दूध और शीतल जल इन अनु-पानोंको प्रमेहके दोषानुसार पृथक् पृथक् विचारकर देवे ॥ ३९-४२ ॥