भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८६२ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह- |
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प्रमेहान्विंशतिं हन्ति वातपित्तकफोद्भवान् ।
द्वन्द्वजान्सन्निपातोत्थान् मूत्रकृच्छ्राश्मरीगदान् ॥
बलवर्णाग्निजननी ज्वरदोषनिषूदिनी ॥ ४३ ॥
यह वटी वातके, पित्तके और कफके रोग अथवा द्विदोषज और त्रिदोषजन्य बीसों प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र और अश्मरी आदि रोगोंको बहुत जल्द आराम करती है तथा ज्वरको नष्टकर बल कान्ति और उदराग्निको बढाती है ॥ ४३ ॥
वेदविद्यावटी ।
पारदाभ्रककान्तानां नागभस्म समं समम् ।
दिनं ब्राह्मीरसैर्मर्द्यं वालुकायन्त्रगं पुनः ॥ ४४ ॥
उद्धृत्य चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं जारिताभ्रं शिलाजतु ।
ताप्यं मण्डूरवैक्रान्तं कासीसं तुल्यमेव च ॥ ४५ ॥
सर्वं सर्वसमं चूर्णं कल्पयेच्च ततः पुनः ।
मुस्तचन्दनपुन्नागनारिकेलस्य मूलकम् ॥ ४६ ॥
कपित्थरजनीदार्बीचूर्णं सर्वसमं भवेत् ।
जम्बीराणां द्रवैर्मर्द्यं द्वियामं वटकीकृतम् ॥ ४७ ॥
वेदविद्यावटी नाम्ना भक्षणात्सर्वमेहजित् ।
मधु धात्रीरसं चानु क्षौद्रैर्वापि गुडूचिका ॥ ४८ ॥
शुद्ध पारा, अभ्रक, कान्तलोह और शीशा इनकी भस्मको बराबर २ लेवे । फिर सबको ब्राह्मीके रसमें एक दिनभर उत्तम विधिसे खरल करके वालुकायन्त्रमें रखकर पकावे । जब पककर शितिल होजाय तब उसको निकालकर बारीक पीस-लेवे । तदनन्तर इस चूर्णके साथ अभ्रकभस्म, शिलाजीत, सोनामाखी, मण्डूरभस्म, वैक्रान्तमणिभस्म, और हीराक्सीस इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर मिलावे एवं नागरमोथा, लालचन्दन, पुन्नागवृक्षकी जड, नारियलकी जड, कैथ, हल्दी और दारुहल्दी इनके समानांश मिलित चूर्णको लेवे । पुनः सबको एकत्रकर जम्बीरीनींबूके स्वरसमें दो प्रहरतक उत्तम प्रकारसे खरलकर तीन तीन मासेकी गोली बनालेवे । इस वेदविद्यानामवाली वटीको प्रतिदिन प्रातःकाल आमलोंके रस और शहद अथवा गिलोयके रस एवं शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके प्रमेह दूर होते हैं ॥