भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 909, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८७७
यह प्रमेहमिहिरनामक तैल सर्वप्रकारके मूत्रविकारोंको नष्ट करता है एवं हाथ, पाँव और शिरमें जलन, दुर्बलता, कृशता, इन्द्रियोंकी क्षीणता और वीर्यहीनताको दूर करता है जो पुरुष स्त्रियोंके साथ अधिक रमण करनेसे क्षीण होगये हैं उनके लिये यह तेल अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, बलकारक, आयुको स्थापन करनेवाला है ४३-४४
प्रमेहमिहिरतैल ।
शतपुष्पा देवकाष्ठं मुस्तकं च निशाद्वयम् ।
मूर्वा कुष्ठं वाजिगन्धा चन्दनद्वयरेणुकम् ॥ ४५ ॥
कटुकी मधुकं रास्ना त्वगेला ब्रह्मयष्टिका ।
चविका धान्यकं वत्सं पूतिकागुरुपत्रकम् ॥ ४६ ॥
त्रिफला नलिका बाला बला चातिबला तथा ।
मञ्जिष्ठा सरलं पद्मं लोध्रं मधुरिका वचा ॥ ४७ ॥
अजाजी चोशीरं जाती वासा तगरपाडुका ।
एतेषां कार्षिकैर्भागैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४८ ॥
शतावर्या रसं तुल्यं लाक्षारसचतुर्गुणम् ।
मस्तु लाक्षारसैस्तुल्यं क्षीरं तुल्यं प्रदापयेत् ॥
द्रव्यैरेतैः पचेत्तैलं गन्धं दत्त्वा यथाक्रमम् ॥ ४९ ॥
प्रथम सोया, देवदारु, नागरमोथा, हल्दी, दारुहल्दी, मूर्वा, कूठ, असगन्ध, श्वेतचन्दन, रक्तचन्दन, रेणुका, कुटकी, मुलहठी, रास्ना; दारचीनी, इलायची, भारङ्गी, चव्य, धनियाँ, इन्द्रजौ, पूतिकरञ्ज, अगर, पत्रज, त्रिफला, नली, सुगन्धवाला, खिरैंटी, कंघी, मंजीठ, धूपसरल, पद्माख, लोध, सौंफ, वच, कालाजीरा, खस; जायफल, अडूसेकी छाल और तगर इन सब ओषधियोंको दो दो तोले लेवे और खूब बारीक कूट पीसकर चूर्ण बनाकर रखलेवे । पश्चात् लाखको ४ प्रस्थ लेकर चौगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई हिस्सा जल बाकी रहजाय तब उतारकर छान लेवे । इस रसके साथ तिलका तेल १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ, दहीका तोड ४ प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ और उपर्युक्त चूर्ण मिलाकर उत्तम रीतिसे तैलको सिद्ध करे । जब यथाविधि पककर सिद्ध होजाय तब पवित्र पात्रमें रखदेवे ॥ ४५-४९ ॥
एतत्तैलवरं श्रेष्ठमभ्यङ्गान्मरुतापहम् ।
विषमाख्याञ्ज्वरान्सर्वान्मेदोमज्जगतानपि ॥ ५० ॥