भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 908, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें८७६ भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-
क्वाथके साथ घी १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ, गौका दूध १ प्रस्थ एवं दाख, खजूर, त्रिफला, रेणुका, जीवकादि गणकी औषधियें, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, कन्दूरी, कूठ, इलायची, विदारीकन्द, कंघी, शिलाजीत, दारचीनी, खस और शोधित कृष्णाभ्रककी भस्म इनके श्लक्ष्णतर कल्कको एक एक तोला मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे अच्छे प्रकार घृतको पकावे ॥ ३६-३७
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति मूत्राघातांस्त्रयोदश ।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ ३८ ॥
वातजं पित्तजं चैव श्लेष्मजं सन्निपातिकम् ।
बृंहणं च विशेषेण सर्वमेहहरं परम् ॥ ३९ ॥
अश्विभ्यां निर्मितं सिद्धं दाडिमाद्यमिदं महत् ॥ ४० ॥
यह महादाडिमाद्य घृत यथाविधि सिद्ध कर सेवन करनेसे २० प्रमेह, १३ मूत्राघात, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, कठिनतर रक्तपित्त, वात पित्त कफ और सन्निपातसे उत्पन्न हुये अनेकों उपद्रव दूर होते हैं और वीर्यवृद्धि तथा पुष्टि होती है ॥
मेहमिहिरतैल ।
पञ्चमूल्यमृताधात्रीदाडिमानां तुलां पचेत् ।
जलद्रोणे स्थिते पादे तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४१ ॥
क्षीरं तैलसमं कल्क़ान् निम्बभूनिम्बगोक्षुरम् ।
दाडिमं रेणुकं बिल्वं दारु दार्वी बलाहकम् ॥
त्रिफला तगरं द्राक्षा जम्ब्वाम्रवल्कलाभयम् ॥ ४२ ॥
पञ्चमूल, गिलोय, आमले और अनारदाना ये सब ओषधें सौ पल लेकर ३२ सेर जलमें पकावे। जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे। पश्चात इस क्वाथमें तिलका तेल १ प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ तथा कलकार्थ नीमकी छाल, चिरायता, गोखुरू, अनारका वक्कल, रेणुका, बेलका गूदा, देवदारु, दारुहल्दी, नागरमोथा, त्रिफला, तगर, दाख, जामुनकी छाल, आमकी छाल और खस ये सब समान भाग मिश्रित आधसेर मिलाकर विधिपूर्वक तैलको सिद्ध करे ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
नाम्नेदं मेहमिहिरं सर्वमूत्रामयाञ्जयेत् ।
हस्तपादशिरोदाहं दौर्बल्यं कृशतां तथा ॥ ४३ ॥
क्षीणेन्द्रिया नष्टशुक्राः स्त्रीक्षीणाश्चापि ये नराः ।
तेषां वृष्यं च बल्यं च वयःस्थापनमेव च ॥ ४४ ॥