भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ५९
शर्करा कटुका मुस्ता गजाह्वा व्याधिघातकः । किराततिक्तममृता दशमूली निदिग्धिका ॥ १९ ॥ योगराजो निहन्त्येष सन्निपातमशेषतः । सन्निपातसमुत्थानं मृत्युमप्यागतं जयेत् ॥ ३२० ॥
सोंठ, धनियां, भारंगी, पद्माख, लालचन्दन, परवल, नीमकी छाल, हरड, बहेडा, आमला, मुलहठी, खिरेंटी, कुटकी, नागरमोथा, गजपीपल, अमलतास, चिरायता, गिलोय, दशमूल और कटेरी इनके क्वाथमें मिश्री डालकर पीनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है। यह योगराजनामक क्वाथ-सन्निपातसे उत्पन्नहुई मृत्युको भी दूर करता है ॥ १८-३२० ॥
शीताङ्ग सन्निपातज्वरकी चिकित्सा।
भास्वन्मूलादि।
भास्वन्मूलं जीरकव्योषभार्गी व्याघ्रीशुण्ठी पुष्करं गोजलेन । सिद्धं सद्यः शीतगात्रार्त्तिमोह- श्वासश्लेष्मोद्रेककासान्निहन्ति ॥ २१ ॥
आककी जड, जीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, भारंगी, कटेरी, सोंठ और पोहकरमूल इनका गोमूत्रमें क्वाथ बनाकर सेवन करनेसे शरीरकी शितलता व पीडा, मोह, श्वास, कफका उद्रेक, खाँसी आदि विकार शीघ्र नाश होते हैं ॥ २१ ॥
प्रलापकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा।
तगरादि।
सतगरवरतिक्ता रेवताम्भोदतिक्ता नलदतुरगगन्धा भारती हारहूरा । मलयजदशमूली शङ्खपुष्पी सुपक्वाः प्रलपनमपहन्युः पानतो नातिदूरात् ॥ २२ ॥
तगर, पित्तपापडा, अमलतास, नागरमोथा, कुटकी, खस, असगन्ध, ब्राह्मी, दाख, लालचन्दन, दशमूल और शंखपुष्पी इनका क्वाथ बनाकर पान करनेने प्रलापक सन्निपातज्वर तत्काल नष्ट होता है ॥ २२ ॥