भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
रक्तष्ठीवनसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
रोहिषादि ।
रोहिषधन्वयवासकवासापर्पटगन्धलताकटुकाभिः ।
शर्करया सममेष कषायः क्षतजष्ठीवन उद्यदुपायः ॥ २३ ॥
रोहिषतृण, धमासा, अडूसा, पित्तपापडा, फूलप्रियंगु और कुटकी इनके क्वाथमें मेश्री मिलाकर पीनेसे क्षतोत्पन्न रुधिरकी वमन सहित सन्निपातज्वर नष्ट होता है। यह प्रयोग अत्यन्त उपयोगी है ॥ २३ ॥
पद्मकादि ।
पद्मकचन्दनपर्पटमुस्तं जाती जीरकचन्दनवारि ।
क्लीतकनिम्बयुतं परिपक्वं वारि भवेदिह शोणितहारि॥ २४ ॥
पद्माख, लालचन्दन, पित्तपापडा, नागरमोथा, चमेलीके फूल, जीरा, लालचन्दन, सुगन्धवाला, मुलहठी और नीमकी छाल इनका बनाया हुआ क्वाथ सन्निपातज्वरमें होनेवाली रक्तकी वमनको दूर करता है ॥ २४ ॥
जिह्वकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
शुण्ठ्यादि ।
विश्वावर्मविभावरीयुगवरावत्सादिनीवारिद-
व्याघ्रीनिम्बपटोलपुष्करजटामास्यादितेयद्रुमैः ।
एभिर्जिह्वकसंनिपातहरणः क्वाथः कृतः सेव्यता-
मित्याज्ञा भिषजामनुग्रहपुरस्सारिण्यहो रोगिषु॥ २५ ॥
सोंठ, पित्तपापडा, हल्दी, दारुहल्दी, हरड, बहेडा, आमला, गिलोय, नागरमोथा, कटेरी, नीमकी छाल, परवल, पोहकरमूल, बालछड और देवदारु इनका क्वाथ पान करनेसे जिह्वकसन्निपातज्वर दूर होता है ॥ २५ ॥
रुग्दाहसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
उशीरादि ।
उशीरचन्दनोदीच्यद्राक्षामलकपर्पटैः ।
शृतं शीतं जलं दद्याद्दाहतृड्ज्वरशान्तये ॥ २६ ॥
खस, लालचन्दन, सुगन्धवाला, दाख, आमले और पित्तपापडा इन ओषधियों का क्वाथ बनाकर शीतल करके दाह और तृषायुक्त ज्वरको शमन करनेके लिये प्रयोग करे ॥ २६ ॥