भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 920, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें८८८ भैषज्यरत्नावली । [ सोमरोग-
२—रससिन्दूर, लोहभस्म, वङ्गभस्म, अफीम, गूलरके बीज, बेलमूलकी छाल और कबाबचीनी इन सबको समान भाग लेकर और एकत्र पीसकर गूलरोंके रसमें विधिपूर्वक खरल करे, फिर दो दो रत्तीकी वटी प्रस्तुत करे । नित्यप्रति प्रातःकाल एक गोली खाय और ऊपरसे गूलरोंका रस तथा मधु एकत्र मिलाकर सेवन करे । इसपर मांसके साथ गेहूँकी रोटी भक्षण करे । यह रस सोमरोगको निश्चय दूर करता है ॥ ४३-४५ ॥
हेमनाथरस ।
सूतं गन्धं हेम ताप्यं प्रत्येकं कोलसम्मितम् ।
अयश्चन्द्रं प्रवालं च वङ्गं चार्द्धं विनिक्षिपेत् ॥ ४६ ॥
फणिफेनस्य तोयेन कदलीकुसुमेन च ।
उदुम्बररसेनापि सप्तधा परिमर्दयेत् ॥ ४७ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुवर्ण, सोनामाखी ये प्रत्येक एक एक तोला, लोहभस्म, कपूर, मूँगा और वङ्गभस्म ये प्रत्येक छः छः मासे लेवे । सबको एकत्र पीसकर अफीम, केले और गूलरके रसमें सातबार यथाक्रम खरल करे ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
वल्लमात्रां वटीं खादेद्यथाव्याध्यनुपानतः ।
प्रमेहान्विंशति हन्ति बहुमूत्रं सुदारुणम् ॥ ४८ ॥
सोमरोगं क्षयं चैव श्वासं कासमुरःक्षतम् ।
हेमनाथरसो नाम्ना कृष्णात्रेयेण भाषितः ॥ ४९ ॥
“रसगन्धकयोः स्थाने षड्गुणो जारितो वलिः ।
प्रयोजितो भवेन्नॄणां विशेषफलदायकः ॥”
पश्चात् दो रत्ती प्रमाण गोलियां बनावे । वातादि दोषोंके अनुसार अनुपानभेदसे प्रतिदिन एक-एक गोली सेवन करे । यह बीसों प्रमेह, दारुण बहुमूत्र, सोमरोग, क्षय, खाँसी, श्वास और उरःक्षत इत्यादि सब रोगोंको नष्ट करता है । इस हेमनाथ-रसको कृष्णात्रेयमुनिने कहा है । “इसमें पारे और गन्धककी अपेक्षा यदि रस-सिन्दूर १ तोला डालदियाजाय तो विशेष लाभ होता है” ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
मालतीकुसुमाकर ।
चन्द्रभागाः सुवर्णस्य कर्पूरं युग्मभागिकम् ।
वङ्गशीशकलौहानां भागत्रयमुदाहृतम् ॥ ५० ॥