भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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८५० भैषज्यरत्नावली । [ सोमरोग-

बल्यः पुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिबर्हणः ।
हन्ति जीर्णज्वरं श्वासं क्षयरोगं कृशाङ्गताम् ॥
नातः परतरं किञ्चिद्रसायनमिहेष्यते ॥ ५९ ॥

इस प्रकार सिद्ध किये हुए वसन्तकुसुमाकरनामक रसकी एक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल शहदके साथ सेवन करे तो सोमरोग, ध्वजभंग, शुक्रप्रमेह, अन्यान्यप्रमेह बहुमूत्र, तृषा, दाह, तालुका सूखना, पुराना ज्वर, श्वास, क्षयरोग, और शरीरकी कृशताप्रभृति समस्त विकार नष्ट होते हैं एव बलदायक, पुष्टिकारक, वीर्यवर्द्धक और ब्याधियोंको क्षय करनेके लिये यह अत्युत्तम रसायन है ॥ ५७–५९ ॥

कस्तूरीमोदक ।

कस्तूरी वनिता क्षुद्रा त्रिफला जीरकद्वयम् ।
एलाबीजं त्वचं यष्टिमधुकं मिषिबालकम् ॥ ६० ॥
शतपुष्पोत्पलं धात्री मुस्तकं भद्रसंज्ञकम् ।
कदलीनां फलं पक्वं खर्जूरं कृष्णकं तिलम् ॥ ६१ ॥
कोकिलाक्षस्य बीजं च माषमात्रं समं समम् ।
यावन्त्येतानि चूर्णानि द्विगुणा सितशर्करा ॥ ६२ ॥
धात्रीरसेन पयसा कूष्माण्डस्वरसेन च ।
विपचेत्पाकविद्वैद्यो मन्दमन्देन वह्निना ॥ ६३ ॥
अवतार्य सुशीते च यथालाभं विनिक्षिपेत् ।
अक्षमात्रां प्रयुञ्जीत सर्वमेहप्रशान्तये ॥ ६४ ॥

कस्तूरी, फूलप्रियंगु, कटेरी, त्रिफला, जीरा, कालाजीरा, छोटी इलायचीके दाने, दारचीनी, मुलहठी, सौंफ, सुगन्धबाला, सोआ, नीलकमल, धायके फूल, नागरमोथा, केलेकी पकी फली, खजूर, काले तिल और तालमखाने इन सबको अलग अलग एक एक माशा लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णसे दुगुनी अत्युज्वल मिश्री तथा आमलोंका रस दूध और पेठेका रस, ये तीनों सबसे चौगुने लेवे । इन औषधियोंको एकत्रकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब अच्छे प्रकार पाक समाप्त होजाय तब उतारकर शीतल होजानेपर एक एक तोलेके लड्डू बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक लड्डू खावे तो सर्वप्रकारके प्रमेह शान्त होते हैं ॥ ६०–६४ ॥