भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें.८९२ भैषज्यरत्नावली । [ सोमरोग-
आमलौंका रस १ प्रस्थ ( ६४ तोले ), विदारीकन्दका रस १ प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ, तृणपञ्चमूलका रस १ प्रस्थ और गोघृत १ प्रस्थ लेवे । इन सबको एकत्र मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा पडजाय तब उसमें इलायची, लौंग, त्रिफला, कैथ, सुगन्धवाला, धूपसरल, बालछड, पकी केलेकी फली और नीलकमलकी जड इन सब औषधियोंके समान भाग मिश्रित १ सेर कल्कको छानंकर डाले और फिर पाक करे । जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब मुलहठी, निसोत, जवारखार, विधारा प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले, खाँड ८ पल तथा शहद ८ पल डालकर करछीसे चलाकर सबको एकमक करलेवे । फिर घृतसे चिकने मिट्टीके बासनमें रखदेवे ॥ ६९-७३ ॥
सोमरोगं निहन्त्याशु तृष्णां दाहमरोचकम् ॥ ७४ ॥
मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रं नाशयेद्बहुमूत्रकम् ।
पित्तजान्विविधान्व्याधीन्वातजांश्च सुदारुणान् ॥ ७५ ॥
करोति शुक्रोपचयं बलवर्णकरं परम् ।
नानारूपविकारघ्नं विशेषाद्बहुमूत्रनुत ॥ ७६ ॥
यह धात्रीघृत सोमरोग, तृषा, दाह, अरुचि, मूत्राघात, मूत्रकृच्छ, बहुमूत्र, पित्तजन्य अनेक रोग, दारुण वातसम्बन्धी विकार, अन्यान्य सर्वप्रकारके रोग, विशेषकर बहुमूत्ररोगको तत्काल विध्वंस करता है । वीर्यकी वृद्धि, बल और कान्तिको उत्पन्न करता है ॥ ७४-७६ ॥
कदल्यादिघृत ।
कदलीकन्दनिर्यासे तत्प्रसूनतुलां पचेत् ।
चतुर्भागावशेषेऽस्मिन्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७७ ॥
चन्दनं सरलं मांसी कदली मूलकं तथा ।
एला लवङ्ग-त्रिफलाकपित्थफलमेव च ॥ ७८ ॥
औदकानि च कन्द्वानि न्यग्रोधादिगणस्तथा ।
^१ न्यग्रोधादिगणो यथा—न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपियालप्लक्षवेतसम् ।
आम्रो जम्बूद्वयं कोल मधुकं तिन्दूकोऽर्जुनः ॥
तिलकःकट्फलो नीपो गर्दभाण्डोऽथ किंशुकः ॥
वड, गूलर, पीपल, चिरौंजीका वृक्ष, पाखर, बेंत, आम, दोनों जामुन, बेर, महुवा, तेन्दु, अर्जुनवृक्ष, महुवावृक्ष, कुटकी, कदम, सिरस और ढाक ।