भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८५३.

कल्केनानेन संसिद्धं सोमरोगनिवारणम् ॥ ७९ ॥ मूत्ररोगानशेषांश्च प्रभूतान् शुक्रपिच्छिलान् । प्रमेहान्विंशतिं चैव मूत्राघातांस्त्रयोदश ॥ ८० ॥ बहुमूत्रं विशेषेण मूत्रकृच्छ्रं तथाऽश्मरीम् । पीतं घृतं निहन्त्याशु विष्णुचक्रमिवासुरान् ॥ कदल्यादिघृतं नाम विष्णुना परिकीर्तितम् ॥ ८१ ॥

केलेके १०० पल फूलोंको केलेके ६४ सेर रसमें पकावे। पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर गौका घी एक प्रस्थ, चन्दन, धूपसरल, बालछड, केलेकी जड, इलायची, लौंग, त्रिफला, कैथ, जलोत्पन्न कन्द (कमलकन्द, कसेरू, नीलकमलकी जड, सिंघाडे, सालग आदि) और न्यग्रोधादिगणकी समस्त औषधियाँ लेवे। इन सबको दो दो तोले कूट पीसकर पूर्वोक्त क्वाथमें डालदेवे। और शनैः शनैः मृदु अग्नि द्वारा यथाविधि घृतको सिद्ध करे। इस घृतको प्रतिदिन नियमानुकूल सेवन करनेसे सोमरोग, सर्वप्रकारके मूत्र-विकार, वीर्यकी पिच्छिलता, २० प्रमेह, १३ मूत्राघात, विशेषकर बहुमूत्र, मूत्रकृच्छ्र और अश्मरीआदिरोग तत्काल इस प्रकार नष्ट होते हैं, जिसप्रकार विष्णुभगवान्‌का सुदर्शनचक्र असुरदलको नाश करदेता है। यह कदल्यादिनामक घृत विष्णुभगवान्‌ने प्रकाशित किया है ॥ ७७-८१ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां सोमरोगचिकित्सा ॥

मेदोरोगकी चिकित्सा ।

श्रमचिन्ताव्यवायाध्वक्षौद्रजागरणप्रियः । हन्त्यवश्यमतिस्थौल्यं यवश्यामाकभोजनैः ॥ १ ॥ अस्वप्नं च व्यवायं च व्यायामं चिन्तनानि च । स्थौल्यमिच्छन्परित्यक्तुं क्रमेणातिप्रवर्द्धयेत् ॥ २ ॥

परिश्रम, चिन्ता, स्त्रीसम्भोग, रास्ताचलना, शहदको पीना, रात्रिमें जागना, जौ और सामा अन्नका भोजन इन सब कृत्योंके करनेसे शरीरकी स्थूलता नष्ट होती है। जो मनुष्य स्थूलताको नष्ट करना चाहते हैं वे रात्रिमें जागना, मैथुन करना, व्यायाम (दंड-कसरत आदि), चिन्ता इनको दिन प्रतिदिन बढानेकी चेष्टा करे, १-२.