भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें.८९४. भैषज्यरत्नावली [ मेदोरोग-
प्रातर्मधुयुतं वारि सेवितं स्थौल्यनाशनम् । उष्णमन्नस्य मण्डं वा पिबन् कृशतनुर्भवेत् ॥ ३ ॥ प्रतिदिन प्रातःसमय शहदको जलमें मिलाकर पान करे तो स्थूलता नष्ट होती है अथवा उष्ण अन्नका माँड पीवे तो स्थूलता दूर होजाती है ॥ ३ ॥
सचव्यजीरकव्योषहिङ्गुसौवर्चलानलाः । मस्तुना सक्तवः पीता मेदोघ्ना वह्निदीपनाः ॥ ४ ॥ चव्य, जीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, हींग, कालानमक और चीतेकी जड इनको समान भाग लेकर एकत्र पीस लेवे फिर इस चूर्णको १६ गुना जौके चूर्णमें मिलाकर दहीके तोडके साथ पान करनेसे स्थूलता नष्ट होती है और अग्नि प्रवृद्ध होती है॥४॥
विडङ्गनागरक्षारकान्तलौहरजो मधु । यवामलकचूर्णं तु प्रयोगः स्थौल्यनाशनः ॥ ५ ॥ वायविडङ्ग, सोंठ, जवाखार, कान्तलोहभस्म, जौ और आमले इन सब औषधियोंके चूर्णको एक एक तोला, किन्तु भस्म सबसे दुगुनी लेवे । फिर सबको एकत्र मधुके साथ मिलाकर चाटनेसे स्थूलता दूर होती है ॥ ५ ॥
बदरीपत्रकल्केन पेया काञ्जिकसाधिता । स्थौल्यनुत्स्यात्साग्निमन्थरसं वापि शिलाजतु ॥ ६ ॥ बेरीके पत्तोंको पीसकर काँजीमें पकाकर पेया बनावे । इसको पीनेसे स्थूलता नष्ट होती है। एवं शिलाजीतको अरणीके रसमें मिलाकर पीनेसे स्थूलपन दूर होता है॥६॥
शिरीषलामज्जकहेमलोध्रैस्त्वग्दोषसंस्वेदहरः प्रघर्षः । पत्राम्बुलोहाभयचन्दनानि शरीरदौर्गन्ध्यहरः प्रदेहः ॥७॥ शिरसकी छाल, खस, नागकेशर और लोध इनके समान भाग मिले हुए चूर्णको शरीरपर मालिश करे तो त्वचाके दोष और अधिक पसीना निकलना बन्द होता है । तेजपात, सुगन्धवाला, अगर, खस, और चन्दन इनको समान भाग लेकर एकत्र खूब बारीक पीसकर मालिश करनेसे शरीरकी दुर्गन्ध दूर होय ॥ ७ ॥
वासादलरसो लेपाच्छङ्खचूर्णेन संयुतः । बिल्वपत्ररसो वापि गात्रदौर्गन्ध्यनाशनः ॥ ८ ॥ अड़ूसेके पत्तोंके रस अथवा बेलपत्रीके रसमें शंखभस्म मिलाकर शरीरपर लेप करनेसे देहकी दुर्गन्ध नष्ट होती है ॥ ८ ॥