भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९०४ | भैषज्यरत्नावली । | [ उदररोग- |
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सामुद्राद्यचूर्ण ।
सामुद्रसौवर्चलसैन्धवानि क्षारं यमानीमजमोदकं च ।
सपिप्पलीचित्रक-शृङ्गवेरं हिङ्गुं विडं चेति समानि कुर्यात् ॥ १५
एतानि चूर्णानि घृतप्लुतानि भुञ्जीत पूर्वे कवले प्रशस्तम् ।
वातोदरं गुल्ममजीर्णभक्तं वातास्रकोपं ग्रहणीं प्रदुष्टाम् ॥
अशांसि दुष्टानि च पाण्डुरोगं भगन्दरं चापि निहन्ति सद्यः १६
समुद्रनमक, कालानमक, सैंधानमक, जवाखार, अजवायन, अजमोद, पीपल, चीता, सोंठ, हींग और विरियासञ्चरनमक इन सबको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको घृतमें मिलाकर भोजनके पहले ग्रासमें खावे । यह चूर्ण वातोदर, गुल्म, अजीर्ण, वातरक्तका कोप, संग्रहणी, दुष्ट बवासीर, पाण्डु और भगन्दरप्रभृतिरोगोंको तत्काल दूर करता है ॥ १५ ॥ १६ ॥
इच्छाभेदीरस १-३ ।
शुण्ठीमरिचसंयुक्तं रसगन्धकटङ्कणम् ।
जैपालास्त्रिगुणाः प्रोक्ताः सर्वमेकत्र पेषयेत् ॥ १७ ॥
इच्छाभेदी द्विगुञ्जा स्यात्सितया सह पाययेत् ।
पिबेत्तु चुलकं यावत्तावद्वारान्विरेचयेत् ॥
तक्रौदनं च दातव्यमिच्छाभेदी यथेच्छया ॥ १८ ॥
१-सोंठ, मिर्च, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और सुहागा ये प्रत्येक एक-एक तोला एवं शुद्ध जमाल गोटा ३ तोले लेवे । फिर सबको एकत्र जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक गोली मिश्रीके साथ सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल पीवे । इसपर जितने घूंट जल पीवेगा उतनी ही बार दस्त होंगे । जब उत्तम रूपसे दस्त होजाय तब यथारुचि मट्ठा मिलाहुआ अन्न भोजन करे ॥ १७ ॥ १८ ॥
सूतं गन्धं च मरिचं टङ्कणं नागराभये ।
जैपालबीजसंयुक्तं क्रमोत्तरगुणं भवेत् ॥ १९ ॥
सर्वतुल्यो गुडो देय इच्छाभेदी त्वयं रसः ।
द्वित्रिगुञ्जापरिमिता वटी कार्या विचक्षणैः ॥ २० ॥
२-शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक दो तोले, काली मिरच ३ तोले सुहागा ४ तोले, सोंठ ५ तोले, हरड ६ तोले और जमाल गोटा ७ तोले लेकर एकत्र