भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९०५

चूर्ण करलेवे । इस समस्त चूर्णकी बराबर भाग पुराना गुड मिलाके अच्छे प्रकार घोटकर दो या तीन रत्ती प्रमाण गोलियाँ बनालेवे । यह इच्छाभेदी रस है । यह भी पूर्वोक्त रसके समान गुणोंवाला है ॥ १९ ॥ २० ॥

शुद्धसूतस्य भागैकं गन्धकान्माषकत्रयम् ।
विभीतकस्य माषैकं धात्र्याश्चैव तु माषकम् ॥ २१ ॥
माषद्वयं च पिप्पल्याः शुण्ठीनां माषकत्रयम् ।
जैपालबीजमज्जाया गुडकं विंशतिं तथा ॥ २२ ॥
अम्ललोणीरसैः पिष्ट्वा वटिकां कारयेद्भिषक् ।
कलायपरिमाणां तु भक्षयेद्रेचनार्थक्रम् ॥ २३ ॥
अम्ललोणीरसैः सार्द्धं तोयमुष्णं पिबेदनु ।
तावद्विरिच्यते वेगान् यावच्छीतं न सेवते ॥ २४ ॥

३-शुद्ध पारा एक मासा, शुद्ध गन्धक ३ मासे, बहेडा एक मासा, आमले एक मासा, पीपल दो मासे, सोंठ ३ मासे, जमाल गोटेकी मींग और पुराना गुड बीस मासे लेवे । इन सबको एकत्र नोनियाके रसमें खरल करके मटरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक गोली खाय और ऊपरसे नोनियाके रसके साथ उष्ण जल पान करे । इसपर जबतक शीतल जल न पिया जायगा तबतक बराबर दस्त होते रहेंगे ॥ २१-२४ ॥

भेदिनावटी ।

त्रिकण्टकस्नुकूपयसा पिप्पल्या वटिका कृता ।
भेदनीया सिद्धिमता महागदनिषूदनी ॥ २५ ॥

गोखुरू और पीपल इनको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें यथाविधि खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनावे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होकर अतिप्रबल उदरादि रोग नष्ट होते हैं ॥ २५ ॥

नाराचरस ।

सूतं टङ्कणतुल्यांशं मरिचं सूततुल्यकम् ।
गन्धकं पिप्पली शुण्ठी द्वौ द्वौ भागौ विचूर्णयेत् ॥ २६॥
सर्वतुल्यं क्षिपेद्दन्तीबीजं निस्तुषमेव च ।
द्विगुञ्जो रेचने सिद्धो नाराचोऽयं महारसः ॥
गुल्मप्लीहोदरं हन्ति पिबेत्तण्डुलवारिणा ॥ २७ ॥