भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६२भैषज्यरत्नावली ।[ चिकित्सा-

किरातादिक्वाथ ।

किरातकटुकाकणा कुटजकण्टकारीशठी-
कलिद्रुकिलिमाभयाकटुककट्फलाम्भोधरैः ।
विषामलकपुष्करानलकुलीरशृङ्गीवृषै-
र्महौषधसखैरयं जयति कण्ठकुब्जं गणः ॥ ३३० ॥

चिरायता, कुटकी, पीपल, कुडेकी छाल, कटेरी, कचूर, बहेडा, देवदारु, हरड, काली मिरच, कायफल, नागरमोथा, अतीस, आमले, पोहकरमूल, चीता, काकडासिंगी, अडूसा, और सोंठ इन सबको समानभाग लेकर, काढा बनाकरके सेवन करने से कण्ठकुब्ज सन्निपातज्वर दूर होता है ॥ ३३०॥

तन्द्रिकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।

क्षुद्रादि ।

क्षुद्रामृतापौष्करनागराणि
शृतानि पीतानि शिवायुतानि ।
शुण्ठीकणागस्तिरसोषणानि
नस्येन तन्द्राविलयोल्बणानि ॥ ३१ ॥

कटेरी, गिलोय, पोहकरमूल और सोंठ इनका क्वाथ बनाकर उसमें हरडका चूर्ण डालकर पीनेसे अथवा सोंठ, पीपल और मिरच इनके चूर्णको अगस्तियाके पत्तोंके रसमें या क्वाथमें पीसकर नस्य लेनेसे तन्द्रिकसन्निपातज्वर दूर होता है ॥ ३१ ॥

भुग्ननेत्रसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।

अश्वगंधादिनस्य ।

तुरंगगन्धालवणोग्रगन्धामधूकसारोषणमागधीभिः ।
बस्ताम्बुशुंठीलशुनान्विताभिर्नस्यं कृशां भुग्नदृशं करोति ॥

असगन्ध, सेंधानमक, वच, महुवेका सार, मिरच, पीपल, सोंठ, और लहसुन इन ओषधियोंके चूर्णको बकरीके मूत्रमें मिलाकर नस्य देनेसे भुग्ननेत्र सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ३२ ॥

सन्धिकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।

बचादि ।

वचाकवचकच्छुरासहचरामृताभंगुरा-
सुराह्वघननागराऽतरुणदारुरास्नापुराः ।