भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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९१२ भैषज्यरत्नावली । [ उदररोग -

त्रिवृतायाः पलं चैकं कुडवं धात्रिकारसात् । तोयप्रस्थेन विपचेच्छनैर्मृद्वग्निना भिषक् ॥ ६६ ॥

गौका घी ३२ तोले एवं थूहरका दूध ८ तोले, थूहरका कल्क ८ तोले कबीला ४ तोले, सेंधानमक २ तोले, निसोत ४ तोले, आमलोंका रस १ कुडव (१६ तोले) और पाकके लिये जल १ प्रस्थ लेवे। फिर सबको एकत्रकर मन्दमन्द अग्निद्वारा यथाविधि घृतको सिद्ध करे ॥ ६५ ॥ ६६ ॥

कर्षप्रमाणं दातव्यं जठरे प्लीहगुल्मयोः । तथा कच्छपरोगेषु युञ्जीत मतिमान् भिषक् ॥ ६७ ॥ एतद् गुल्मान्सनिचयान् समूलान्सपरिग्रहान् । निहन्त्येष प्रयोगो हि वायुर्जलधरानिव ॥ ६८ ॥ पञ्चगुल्मवधार्थाय वज्रमुक्तं स्वयम्भुवा । महाबिन्दुघृतं नाम सिद्धं सिद्धैश्च पूजितम् ॥ ६९ ॥

इस घृतमेंसे उदररोग, तिल्ली, गुल्म और कच्छपरोगवाले मनुष्योंको दो दो तोले प्रमाण देवे । यह घृत संपूर्ण उपद्रवोंसहित सर्वप्रकारके गुल्मोंको इस प्रकार समूल नष्ट करता है, जिस प्रकार वायु मेघोंके समूहको छिन्न भिन्न करदेता है । पांचों प्रकारके गुल्मोंको नाश करनेके लिये यह वज्रकी समान है ऐसा ब्रह्माजीने कहा है । यह महाबिंदुनामक घृत सिद्ध जनोंसे पूजनीय है ॥

नाराचघृत ।

स्नुक्क्षीरदन्तीत्रिफलाविडङ्गसिंहीत्रिवृच्चित्रककल्क- युक्तम् । घृतं विपक्वं कुडवप्रमाणं तोयेन तस्याक्षमथा- र्द्धमक्षम् ॥ ७० ॥ पीत्वोष्णमम्भोऽनु पिबेद्विरिक्तः पेयां सुखोष्णां प्रपिबेद्विहिज्ञः । नाराचमेतज्जठरामयानां युक्त्योपयुक्तं शमनं प्रदिष्टम् ॥ ७१ ॥

थूहरका दूध, दन्तीमूल, त्रिफला, वायविडङ्ग, कटेरी, निसोत और चीतेकी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर कल्क बनालेवे । फिर इस कल्कके द्वारा १६ तोले घृतको पकावे । इस नाराचघृतको जलके साथ एक तोला अथवा दो तोले प्रमाण सेवन करे और ऊपरसे गरम जल पीवे । जब अच्छेप्रकार दस्त होजायँ तब बुद्धिमान् पुरुष मन्दोष्ण पेयाको पान करे । युक्तिसे प्रयोग कियाहुआ यह नाराचघृत उदरके सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करदेता है ॥ ७० । ७१ ॥