भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 945, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 945

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९१३

बृहन्नाराचघृत । लोध्रचित्रकचव्यानि विडङ्गं त्रिफला त्रिवृत् । शङ्खिन्यतिविषा व्योषमजमोदा निशाद्वयम् ॥ ७२ ॥ दन्ती च कार्षिकं सर्वं गोमूत्रस्य पलाष्टकम् । चतुःपलं स्नुहीक्षीरं राजवृक्षफलं तथा ॥ ७३ ॥ एतैश्चतुर्गुणे तोये घृतप्रस्थं विपाचयेत् । उदरं चोष्णवातं च गुल्मप्लीहभगन्दरान् ॥ ७४॥ निहन्त्यचिरयोगेन गृध्रसीं स्तम्भमूरुजम् । बृहन्नाराचकं नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् ॥ ७५ ॥

लोध, चीता, चव्य, वायविडङ्ग, त्रिफला, निसोत, चोरपुष्पी, अतीस, त्रिकुटा, अजमोद, हल्दी, दारुहल्दी और दन्ती ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर एकत्र कूट पीसकर कल्क बनालेवे। फिर यह कल्क एवं गोमूत्र ८ पल, थूहरका दूध ४ पल और अमलतासका गूदा ४ पल चौगुने जलमें डालकर एक प्रस्थ घृतको उत्तम विधिसे पकावे। इसके सेवन करनेसे उदररोग, उष्णवात, गुल्म, प्लीहा, भगन्दर, गृध्रसी और ऊरुस्तम्भादिरोग अल्प समयमें ही दूर होते हैं। यह बृहन्नाराचनाम-वाला घृत अमृतके समान गुणकारी है ॥ ७२–७५ ॥

उदररोगमें पथ्य । विरेचनं लङ्घनमाब्दसम्भवाः कुलत्थमुद्गारुणशालयो यवाः। मृगद्विजा जाङ्गलसंज्ञयाऽन्विता पेयासुरा-माक्षिकसीधुमाधवाः॥७६॥ तक्रं रसोना रुबुतैलमार्द्रकं शालिञ्चशाकं कुलकं कठिल्लकम् । पुनर्नवा शिग्रुफलं हरीतकी ताम्बूलमेला यवशूकमायसम् ॥७७॥ अजाग-वोष्ट्रीमहिषीपयो जलं लघूनि तिक्तानि च दीपनान्यपि । वस्त्रेण संवेष्टनमग्निकर्मतो विषप्रयोगोऽनुयुतो यथायथम् ॥

विरेचन, लङ्घन, पुरानी कुलथी, मूँग, लालशालिके चावल, जौ एवं जङ्गली-पशु-पक्षियोंका मांसरस, पेया, मदिरा, शहद, सीधु, माधव ( मद्यविशेष ), मट्ठा, लहसन, अण्डीका तेल, अदरख, शालिञ्चशाक, परवल, करेला, पुनर्नवा, सहिंज-नेकी फली, हरड, पान, इलायची, जवाखार, लोहा, बकरी गौ ऊँटनी और भैंसका, दूध एवं इन सबका मूत्र, हल्के, कडुवे और पाचकद्रव्य, वस्त्रसे उदरको लपेटना

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