भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९१५

मूलं पिष्ट्वा चित्रकस्य कृत्वा तु वटिकात्रयम् ।
कदलीपक्वमध्येन भक्षणात्प्लीहनाशनम् ॥ २ ॥
चीतेकी छः मासे जडको जलमें पीसकर तीन गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली पकीहुई केलेकी फलीमें रखकर तीन दिनतक सेवन करनेसे प्लीहा नाश होती है ॥ २ ॥

गुडैश्चित्रकमूलं वा रजन्यर्कदलं तथा ।
धातकीपुष्पचूर्णं वा प्रत्येकं प्लीहनाशनम् ॥ ३ ॥
चीतेकी जड, हल्दी, आकके पत्ते अथवा धायके फूलोंका चूर्ण इनमेंसे किसी एकको गुडके साथ खावे तो प्लीहा दूर होती है ॥ ३ ॥

रसेन जम्बीरफलस्य शङ्खनाभीरजः पीतमशेषमेव ।
कर्षप्रमाणं शमयेत्सशूलं प्लीहामयं कूर्मसमानमाशु ॥ ४ ॥
शंखनाभिके चूर्णको एक तोला प्रमाण लेकर जम्बीरी नींबूके रसके साथ पीनेसे शूलसहित कूर्मके समानवाली सर्वप्रकारकी प्लीहा शीघ्र नष्ट होय ॥ ४ ॥

दध्ना भुक्तवतो वामबाहुमध्ये शिरां भिषक् ।
विध्येत्प्लीहविनाशाय यकृन्नाशाय दक्षिणे ॥ ५ ॥
प्लीहानं मर्दयेद्गाढं दुष्टरक्तं प्रवर्त्तयेत् ॥ ६ ॥
प्लीहाको नष्ट करनेके लिये प्रथम रोगीको दहीसहित अन्न भक्षण करावे । पश्चात् बाँये हाथकी कूर्परसन्धिके बीचकी शिराको वेधे और यकृतको दूर करनेके लिये दहिने हाथकी शिराको वेधे । शिरावेध करके दूषित रक्तको निकालनेके लिये प्लीहा और यकृत् स्थानको जोरसे दबावे ॥ ५ ॥ ६ ॥

लशुन पिप्पलीमूलमभयां चैव भक्षयेत् ।
पिबेद्गोमूत्रगण्डूषं प्लीहरोगनिवृत्तये ॥ ७ ॥
प्लीहारोगको निवारण करनेके लिये लहसन, पीपलामूल और हरड इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर गोमूत्रके साथ पान करे ॥ ७ ॥

प्लीहजिच्छङ्खपुष्पायाः कल्कस्तकेण सेवितः ॥ ८ ॥
शंखपुष्पीकी जडको जलमें पीसकर मट्ठेमें मिलाकर पीवे तो प्लीहा दूर होय ८

यमानिकादिचूर्ण ।

यमानिका चित्रकयावशूकषड्ग्रन्थिदन्तीमगधोद्भवानाम् ।
प्लीहानमेतद्विनिहन्तिचूर्णमुष्णाम्बुना मस्तुसुरासवैर्वा ॥ ९ ॥