भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९१६ भैषज्यरत्नावली । [ प्लीहा-यकृत-
अजवायन, चीतेकी जड, जवाखार, पीपलामूल, दन्ती और पीपल इन औष- धियोंके समान भाग चूर्णको गरम जल, दहीका तोड, मदिरा अथवा आसवके साथ सेवन करनेसे प्लीहारोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥
गुडूच्यादिचूर्ण ।
गुडूच्यतिविषा शुण्ठी भूनिम्बयवतिक्तकम् ।
मुस्ता कणा यवक्षारः कासीसं भ्रमरातिथिः ॥
एतेषां समभागेन चूर्णमेव विनिर्दिशेत् ॥ १० ॥
यकृत्प्लीहपाण्डुरोगमग्निमान्द्यमरोचकम् ।
ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ११ ॥
नानादोषोद्भवं चैव वारिदोषभवं तथा ।
विरुद्धभेषजभवं ज्वरमाशु व्यपोहति ॥ १२ ॥
गिलोय, अतीस, सोंठ, चिरायता, महातिक्तक, नागरमोथा, पीपल, जवाखार कसीस और चम्पावृक्षकी छाल इन सबको समान भाग ग्रहण करके एकत्र कूट पीसकर चूर्ण बनालेवे । इस चूर्णको उपयुक्त मात्रासे सेवन करनेपर यकृत, प्लीहा, पाण्डु, मन्दाग्नि, अरुचि, आठों प्रकारके ज्वर, साध्य व असाध्य अनेक दोषोंसे उत्पन्न हुए ज्वर, जलके दोषसे अथवा प्रकृतिविरुद्ध औषधि सेवन करनेसे उत्पन्न हुए ज्वरादि रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ १०-१२ ॥
रोहीतकाद्यचूर्ण ।
रोहीतकं यवक्षारो भूनिम्बं कटुरोहिणी ।
मुस्तकं नरसारं च वीरा विश्वं सुचूर्णितम् ॥ १३ ॥
माषमात्रं ततः खादेच्छीततोयानुपानतः ।
यकृद्रोगं निन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १४ ॥
रोहेडा वृक्षकी छाल, जवाखार, चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, नौसादर, अतीस और सोंठ इनको समानांश लेकर उत्पन्न चूर्ण बनालेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इस चूर्णको एक एक मासा शीतल जलके साथ खाय । यह चूर्ण यकृत्रोगको एकदम इस भाँति नष्ट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य तमको ॥ १३ ॥ १४ ॥
मानकादिगुटिका ।
मानमार्गामृता वासा स्थिरा सैन्धवचित्रकम् ।
नागरं तालपुष्पं च प्रत्येकं च त्रिकार्षिकम् ॥ १५ ॥