भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
९१६ भैषज्यरत्नावली । [ प्लीहा-यकृत-
अजवायन, चीतेकी जड, जवाखार, पीपलामूल, दन्ती और पीपल इन औष- धियोंके समान भाग चूर्णको गरम जल, दहीका तोड, मदिरा अथवा आसवके साथ सेवन करनेसे प्लीहारोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥
गुडूच्यादिचूर्ण ।
गुडूच्यतिविषा शुण्ठी भूनिम्बयवतिक्तकम् ।
मुस्ता कणा यवक्षारः कासीसं भ्रमरातिथिः ॥
एतेषां समभागेन चूर्णमेव विनिर्दिशेत् ॥ १० ॥
यकृत्प्लीहपाण्डुरोगमग्निमान्द्यमरोचकम् ।
ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ११ ॥
नानादोषोद्भवं चैव वारिदोषभवं तथा ।
विरुद्धभेषजभवं ज्वरमाशु व्यपोहति ॥ १२ ॥
गिलोय, अतीस, सोंठ, चिरायता, महातिक्तक, नागरमोथा, पीपल, जवाखार कसीस और चम्पावृक्षकी छाल इन सबको समान भाग ग्रहण करके एकत्र कूट पीसकर चूर्ण बनालेवे । इस चूर्णको उपयुक्त मात्रासे सेवन करनेपर यकृत, प्लीहा, पाण्डु, मन्दाग्नि, अरुचि, आठों प्रकारके ज्वर, साध्य व असाध्य अनेक दोषोंसे उत्पन्न हुए ज्वर, जलके दोषसे अथवा प्रकृतिविरुद्ध औषधि सेवन करनेसे उत्पन्न हुए ज्वरादि रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ १०-१२ ॥
रोहीतकाद्यचूर्ण ।
रोहीतकं यवक्षारो भूनिम्बं कटुरोहिणी ।
मुस्तकं नरसारं च वीरा विश्वं सुचूर्णितम् ॥ १३ ॥
माषमात्रं ततः खादेच्छीततोयानुपानतः ।
यकृद्रोगं निन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १४ ॥
रोहेडा वृक्षकी छाल, जवाखार, चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, नौसादर, अतीस और सोंठ इनको समानांश लेकर उत्पन्न चूर्ण बनालेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इस चूर्णको एक एक मासा शीतल जलके साथ खाय । यह चूर्ण यकृत्रोगको एकदम इस भाँति नष्ट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य तमको ॥ १३ ॥ १४ ॥
मानकादिगुटिका ।
मानमार्गामृता वासा स्थिरा सैन्धवचित्रकम् ।
नागरं तालपुष्पं च प्रत्येकं च त्रिकार्षिकम् ॥ १५ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९१७
विड्सौवर्चलक्षारपिप्पल्यश्चापि कार्षिकाः ।
एतच्चूर्णीकृतं सर्वं गोमूत्रस्याढके पचेत् ॥ १६ ॥
सान्द्रीभूते गुडीः कुर्याद्दत्त्वा त्रिपलमाक्षिकम् ।
यकृत्प्लीहोदरहरो गुल्मार्शोग्रहणीहरः ॥
योगः परिकरो नाम्ना ह्यग्निसन्दीपनःपरः ॥ १७ ॥
मानकन्द, चिरचिरेकी जडकी भस्म, गिलोय, अडूसेकी छाल, शालपर्णी, सेंधानमक, चीता, सोंठ और ताडके फूलोंका खार ये प्रत्येक तीन तीन तोले, विडनमक, कालानमक, जवाखार और पीपल ये प्रत्येक औषधि एकएक तोला लेवे । सबको एकत्र चूर्ण करके ८ सेरगोमूत्रमें पकावे । पकते २ जब गाढा होजाय तब उतारलेवे और शितल होजानेपर १२ तोले शहद डालकर गोलियाँ बनालेवे । यह गुटिका यकृत प्लीहा, उदररोग गुल्म, अर्श और संग्रहणी आदि रोगोंको नाश करती है एवं अग्निको दीपन करती है ॥ १५-१७ ॥
वह्निमानादिगुडिका ।
मानमार्गस्थिरावह्निस्नुहीनागरसैन्धवम् ।
तालरण्डं कृमिघ्नं च हबुषं चविका वचा ॥ १८ ॥
विड्सौवर्चलक्षारपिप्पलीशरपुङ्खकम् ।
जीरकं पारिभद्रं च प्रत्येकं कषकद्वयम् ॥ १९ ॥
सार्द्धाढके गवां मूत्रे पचेत्सर्वं सुचूर्णितम् ।
सान्द्रीभूते क्षिपेदेषां चूर्णकं कर्षसंमितम् ॥ २० ॥
अजाजी त्र्यूषणं हिङ्गु यमानी पुष्करं शठी ।
त्रिवृद्दन्ती विशाला च दत्त्वा त्रिपलमाक्षिकम् ॥
खादेदग्निबलापेक्षी बुद्ध्वा चानु पिबेन्नरः ॥ २१ ॥
पुराना मानकन्द, चिरचिरा, शालपर्णी, चीता, थूहरकी जड, सोंठ, सेंधानमक, ताडकी जटाओंकी भस्म, वायविडङ्ग, हाऊबेर, चव्य, वच, विडनमक, कालानमक, जवाखार, पीपल, शरफोंका, जीरा और फग्हद इन औषधियोंके दो दो कर्ष बारीक पिंसेहुए चूर्णको डेढ आढक गोमूत्रम पकावे । पकते २ जब गाढा पडजाय तब निम्नलिखित औषधियोंके उत्तम प्रकारसे पीसे हुए एक एक कर्ष पारमाण चूर्णकों डालदेवे । कालाजीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, हींग, अजवायन, पोहकरमूल, कंचूर,
९१८ भैषज्यरत्नावली । [प्लीहा-यकृत्-
निसोत, दन्ती और इन्द्रायणकी जड इनके चूर्णको डालकर उतार लेवे । पुनः शीतल होजानेपर १२ तोले शहद मिलादेवे । तदनंतर इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःसमय अपनी अग्निका बलाबल विचारकर उपयुक्त परिमाणमें सेवन करे और दोषानुसार अनुपान प्रयोग करे ॥ १८-२१ ॥
यकृत्प्लीहोदरानाहगुल्मं पाण्डुं सकामलम् ॥ २२ ॥ कुक्षिशूलं च हृच्छूलं पार्श्वशूलमरोचकम् । शोथं च श्लीपदं हन्ति जीर्णं च विषमज्वरम् ॥ २३ ॥
इससे यकृत, प्लीहा, उदररोग अफारा, गुल्म, पाण्डु, कामला, कुक्षिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल, अरुचि, सूजन, श्लीपद, जीर्णज्वर, और विषमज्वरादि विकार शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥
अर्कलवण ।
अर्कपत्रं सलवणमन्तर्धूमं दहेन्नरः । मस्तुना तत्पिबेत्क्षारं प्लीहगुल्मोदरापहम् ॥ २४ ॥
आकके पत्ते और सेंधानमक इनको समान भाग लेकर अन्तर्धूम (जिसमें धुआँ न निकले) पात्रमें दग्ध करे । फिर इस खारको दहीके तोडके साथ पान करे तो प्लीहा, गुल्म, और उदररोग दूर होते हैं ॥ २४ ॥
अभयालवण ।
पारिभद्रपलाशाक्र्कस्नुह्यपामार्गचित्रकान् । वरुणाग्निमन्थवसुश्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥ २५ ॥ पूतिकास्फोटकुटजकोषातक्यः पुनर्नवा । समूलपत्रशाखाश्च क्षोदयित्वा उदूखले ॥ २६ तिलनालप्रदीप्ताग्निसुदग्धं भस्म शीतलम् । क्षारप्रस्थं गृहीत्वा तु न्यसेत्पात्रे दृढे नवे ॥ २७ ॥ जलद्रोणे विपक्तव्यं ग्राह्यं पादावशेषितम् । पूर्ववत्क्षारकल्केन स्रावयित्वा विचक्षणः ॥ २८ ॥ प्रस्थमेकं च लवणं तदर्द्धां च हरीतकीम् । तुल्याम्बुभागं गोमूत्रं साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ २९ ॥ किञ्चित्सबाष्पसान्द्रे च सम्यक् सिद्धेऽवतारिते ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९१९
अजाजी त्र्यूषणं हिङ्गु यमानी पौष्करं शठी ॥
एतैरर्द्धपलैर्भागैश्चूर्णं कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ३० ॥
फरहदकी छाल, ढाककी छाल, आक, थूहर, चिरचिटा, चीतेकी जड, वरनाकी छाल, अरणी, बकवृक्षकी छाल, गोखुरू, कटाई, कटेरी, दुर्गन्धकरञ्ज, आस्फोटलता ( कोरल इति महाराष्ट्रभाषा ), कुडेकी छाल, कडवी तोरई और पुनर्नवा इन सबको पञ्चाङ्गसहित समान भाग लेकर ओखलीमें कूटलेवे । फिर एक हाँडीमें रख उसका मुँह बन्द करके तिलोंकी लकड़ियोंके द्वारा भस्म कर लेवे । जब शीतल होजाय तब उसमेंसे नितारकर १ प्रस्थ खारको ग्रहण कर एक द्रोण ( ३२ सेर ) जलमें सुदृढ और नवीन पात्रमें भरकर पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर पूर्वोक्त क्षारपाककी विधिके अनुसार इस जलको पकावे और इसमें सैंधानमक एक प्रस्थ, हरड ३२ तोले और गोमूत्र ८ सेर डालकर मन्द-मन्द अग्निद्वारा अच्छे प्रकारसे पकावे । जब पाक यथाविधि पककर तैयार होजाय तब उतार लेवे और भाफ उठतेहुए पाकमें कालाजीरा, त्रिकुटा, हींग, अजवायन, पोहकरमूल तथा कचूर इनके दो दो तोले चूर्णको खूब बारीक पीसकर मिलादेवे ॥
अभयालवणं नाम भक्षयेच्च यथाबलम् ॥ ३१ ॥
व्याधिं संवीक्ष्य मतिमाननुपानं यथाहितम् ।
ये च कोष्ठगता रोगास्तान्निहन्ति न संशयः ॥ ३२ ॥
यकृत्प्लीहोदरानाहगुल्माष्ठीलाग्निमान्द्यजित् ।
हन्याच्छिरोऽर्त्तिं हृद्रोगं शर्कराश्मरिनाशनम् ॥ ३३ ॥
रोगीके बलानुसार इस अभयालवणको भक्षण कराना चाहिये । एवं बुद्धिमान् वैद्य रोगको भलीभाँति विचारकर हितप्रद अनुपानकी कल्पना करे । यह अभयालवण कोष्ठस्थित रोगों तथा यकृत्, प्लीहा, उदररोग, आनाह, गुल्म, अष्ठीला, मन्दाग्नि, वमन, शिरोरोग, हृदयरोग, शर्करायुक्त प्रमेह और अश्मरीप्रभृति रोगोंको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ ३१-३३ ॥
वर्द्धमानपिप्पली ।
क्रमवृद्ध्या दशाहानि दशपिप्पलकं दिनम् ।
वर्द्धयेत्पयसा सार्द्धं तथैवापनयेत्पुनः ॥ ३४ ॥
जीर्णेऽजीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ।
पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनः ॥ ३५ ॥
९२० | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत्-
पहले दिन १० पीपल और दूसरे दिन २० इस क्रमसे दूधके साथ सेवन करताहुआ दस दिनतक दस दस पीपलोंकी मात्रा बढाकर सौतक करलेवे । फिर इसी प्रकार प्रतिदिन दसदस पीपल घटाता जावे । एवं पूर्वोक्त नियमानुसार दूसरीवार प्रतिदिन दस दस पीपलोंकी वृद्धि करे । इसतरह न्यूनाधिकता करते करते एक हजारकी संख्या तक पीपलोंको सेवन करे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
दशपैप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्त्तितः ।
यस्त्रिपिप्पलिपर्थ्यन्तः प्रयोगः सोऽवरः स्मृतः ॥ ३६ ॥
बृंहणं वृष्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम् ।
वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीनां रसायनम् ॥
पञ्चपिप्पलिकं चापि दृश्यते वर्द्धमानकम् ॥ ३७ ॥
पीपल सेवन करनेकी विधि तीन प्रकारकी हैं । जैसे-प्रतिदिन १० पीपल सेवन करना उत्तम, प्रतिदिन छः पीपल सेवन करना मध्यम और प्रतिदिन तीन पीपल सेवन करना कनिष्ठ मात्राविधि है । यह प्रयोग रसायन, पुष्टिकारक, वीर्य्यवर्द्धक, आयुको स्थापन करनेवाला, मेधाजनक तथा प्लीहा और उदररोगको नष्ट करनेवाला है । किसी किसी आयुर्वेदिक ग्रंथोंमें प्रतिदिन पांच पांच पीपलोंको वृद्धिकरनेका नियम वर्णन किया है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
“ पिष्ठा च बलिभिः पेया शृता मध्यबलैर्नरैः ॥
शीतीकृत्य ह्रस्वबलैर्देहदोषामयान्विति ॥ ”
“ बलवान् रोगीको पीपलका चूर्ण, मध्यम अवस्थावाले रोगीको पीपलका क्वाथ और दुर्बल रोगीको पीपलका क्वाथ शीतल करके सेवन करावे । ”
इसपर औषधिके जीर्ण होनेपर सांठीके चावल, दूध और घृतके साथ भक्षण करे । इसप्रकार वर्णन कियेहुए पीपलके प्रयोगको सेवन करनेकी प्रथा वर्त्तमानकालमें नहीं है, इसलिये एक रत्तीसे लेकर दो, तीन, चार, पाँच अथवा छःरत्ती परिमाणतक प्रतिदिन बढाकर दसदिनतक बढावे । फिर इसी क्रमसे घटाताजावे । इस तरह सेवन करनेसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है ॥
गुडपिप्पली ।
तुलैकं गुडमादाय पिप्पलीं च तथैव च ।
हिङ्गु त्रिकटुकं मानं सैन्धवानां द्विकार्षिकम् ॥ ३८ ॥
चित्रकं च विडं चैव द्वौ क्षारौ शिखरी तथा ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९२१
तालपुष्पं कोकिलाक्षं चिञ्चाक्षारं सफेनकम् ॥
स्नुहीक्षीरसमायुक्तं प्लीहज्वरविनाशनम् ॥ ३९ ॥
गुड १०० पल, पीपलका चूर्ण १०० पल, हींग, त्रिकुटा, मानकन्द, सेंधानमक प्रत्येक दो दो कर्ष, चीता, विडनमक, जवाखार, सज्जी, चिरचिटेकी मूलकी भस्म, ताडके फूलोंकी भस्म, तालमखाना, इमलीका खार, समुद्रफेन और थूहरका दूध इन सबको दो दो कर्ष परिमाण लेकर कूटपीसकर पाँच पाँच रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसको सेवन करनेसे प्लीहा और ज्वर दूर होता है ॥ ३९ ॥
बृहद्गुडपिप्पली ।
विडङ्गं त्र्यूषणं कुष्ठं हिङ्गुलवणपञ्चकम् ।
त्रिक्षारं फेनकं वह्नि श्रेयसी चोपकुञ्चिका ॥ ४० ॥
तालपुष्पोद्भवं क्षारं नाड्यः कूष्माण्डकस्य च ।
अपामार्गस्य चिञ्चायाश्चूर्णानि चिक्कणानि च ॥ ४१ ॥
सर्वचूर्णसमं देयं चूर्णमत्र कणोद्भवम् ।
एतस्माद्द्विगुणाच्चूर्णात्पुराणो द्विगुणो गुडः ॥ ४२ ॥
मर्दयित्वा दृढे पात्रे मोदकानुपकल्पयेत् ।
भक्षयेदुष्णतोयेन प्लीहानं हन्ति दुस्तरम् ॥ ४३ ॥
यकृतं पञ्चगुल्मं च उदरं सर्वरूपकम् ।
जीर्णज्वरं तथा शोथं कासं पञ्चविधं तथा ॥
अश्विभ्यां निर्मिता श्रेष्ठा बालानां गुडपिप्पली ॥ ४४ ॥
वायविडङ्ग, त्रिकुटा, कूठ, हींग, पाँचों नमक, जवाखार, सज्जी, सुहागा, समुद्रफेन, चीतेकी जड, गजपीपल, कालाजीरा, ताडके फूलोंकी भस्म, पेठेकी डंडी, चिरचिटेकी जडकी भस्म और इमलीकी छालकी भस्म इन सब ओषधियोंका चूर्ण समान भाग और समस्त चूर्णके समान भाग पीपलका चूर्ण एवं सब चूर्णसे दुगुना पुराना गुड मिलाकर एकत्र दृढ पात्रमें उत्तम प्रकारसे खरल करके १ आना भरके लड्डू बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल गरम जलके साथ एक मोदक सेवन करे तो यह मोदक दुस्तर प्लीहा, यकृत, पाँचों प्रकारके गुल्म, सर्वप्रकारके उदरविकार, जीर्णज्वर, शोथ और पाँचों प्रकारकी खाँसी इत्यादि रोगोंको शीघ्र नष्ट करती है । यह गुडपिप्पली बालकोंके लिये अत्यन्त हितकारी है । इसको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है ॥ ४०-४४ ॥
| ९२२ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत् - |
|---|
रसराज ।
गन्धकेन मृतं ताम्रं शुद्धगन्धकतुल्यकम् ।
द्वयोः पादं शुद्धरसं मर्दयेच्छूरणद्रवैः ॥
पुटेद्गजपुटे विद्वान् स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ४५ ॥
गन्धकद्वारा भस्म किया ताँबा १ तोला, शुद्ध गन्धक १ तोला शुद्ध पारा ६ माशे इन सबोंको जिमीकन्दके रसमें खरल करके गजपुटमें रख पुटपाक करे । जब पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे ॥ ४५ ॥
गुञ्जाद्वयं लिहेत्क्षौद्रैः प्लीहगुल्मविनाशनम् ।
यकृच्छूलं ज्वरं हन्ति कान्तिपुष्टिविवर्द्धनः ॥ ४६ ॥
रसराज इति ख्यातो रोगवारणकेसरी ॥ ४७ ॥
इसको दो रत्तीभर शहदमें मिलाकर चाटे तो प्लीहा, गुल्म, यकृद्रोग, शूल और ज्वरादि विकार नष्ट होते हैं । यह रसराज रोगरूपी हाथीको नाश करनेके लिये सिंहके समान है तथा कान्तिवर्द्धक और पुष्टिकारक है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
प्लीहान्तकरस ।
ह्रदशुल्बं च तारं च गगनायसमौक्तिकाः ।
दरदं पुष्पकं सूतं गन्धकं नवमं तथा ॥ ४८ ॥
गुग्गुलुस्त्रिकटू रास्ना तथा जैपालबीजकम् ।
त्रिफला कटुका दन्ती देवदाली तु सैन्धवम् ॥ ४९ ॥
त्रिवृता तु यवक्षारो वातारितैलमर्दितम् ।
अष्टोदराणि पाण्डुत्वमानाहं विषमज्वरम् ॥ ५० ॥
अजीर्णं कफमामं च क्षयं च सर्वशूलकम् ।
कासं श्वासं च शोथं च सर्वमाशु व्यपोहति ॥
प्लीहान्तको रसो नाम प्लीहोदरविनाशनः ॥ ५१ ॥
ताँबेकी भस्म, चाँदीकी भस्म, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मोतीकी भस्म, सिंगरफ़, काँसीकी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध गूगल, त्रिकुटा, रायसन, जमाल गोटा त्रिफला, कुटकी, दन्ती, कडवी तोरई, सैंधानोन, निसोत और जवाखार इन औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर अण्डीके तेलमें अच्छे प्रकार खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करे तो यह आठों प्रकारके उदररोग, पाण्डुरोग, अफारा, विषमज्वर, अजीर्ण, कफरोग, आमवात, क्षय, सब
चिकित्सा । | गदाधरटीकासहिता । | ९२३
शूलरोग, खाँसी, श्वास, सूजन प्लीहोदर एवं सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । इसका नाम प्लीहान्तक रस है ॥ ५१ ॥
वासुकीभूषणरस ।
सूतेन वङ्गं तु समं नियोज्य तत्तुल्यशुल्बेन च गन्धकेन ।
विमर्द्दयेदर्कदलेन यामं मृदा च संलिप्य पुटं ददीत ॥ ५२ ॥
वासारसैरस्तं परिभावयेच्च रसो भवेद्वासुकिभूषणोऽयम् ।
प्लीह्रश्च गुल्मस्य च शान्तयेऽस्य वल्लं प्रदद्याद्रुसुचूर्णयुक्तम् ॥५३॥
शुद्ध पारा, वङ्गभस्म, ताम्रभस्म और शुद्ध गन्धक इन द्रव्योंको समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें एक प्रहरतक यथाविधि खरल करे । फिर गोलासा बनाकर मूषायन्त्रमें रखे और मृत्तिकासे लेपकर पुटपाक करे । जब शीतल होजाय तब निकालकर अडूसेके रसमें भावना देवे । इस प्रकार यह वासुकिभूषण नामवाला रस तैयार होता है । प्लीहा और गुल्मरोगको निवारण करनेके लिये इस रसकी दो रत्ती मात्राको सेंधेनमकमें मिलाकर सेवन करावे ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
विद्याधररस ।
गन्धकं तालकं ताप्यं मृतं ताम्रं मनःशिला ।
शुद्धसूतं च तुल्यांशं मर्द्दयेद्भावयेद्दिनम् ॥ ५४ ॥
पिप्पल्याश्च कषायेण वज्रीक्षीरेण भावयेत् ।
वल्लं च भक्षयेत्क्षौद्रैर्गुल्मप्लीहादिकं जयेत् ॥
रसो विद्याधरो नाम गोदुग्धं च पिबेदनु ॥ ५५ ॥
शुद्ध गन्धक, हरिताल, सोनामाखी, ताँबेकी भस्म, मैनसिल, और शुद्ध पारा ये सब औषधियाँ बराबर बराबर लेकर एकत्र खरल करे । फिर पीपलके क्वाथ और थूहरके दूधमें अलग अलग एक एक दिन भावना देवे । इस रसको दो रत्ती प्रमाण शहदके साथ मिलाकर भक्षण करे तो इससे गुल्म प्लीहा आदि दूर होते हैं। इसका नाम विद्याधर रस है। इसके सेवन करनेपर गोदुग्ध पान करे ॥ ५४॥५५ ॥
लोकनाथरस १-२ ।
पारदं गन्धकं चैव समभागं विमर्द्दयेत् ।
मृताभ्रं रसतुल्यं च पुनस्तत्रैव मर्दयेत् ॥ ५६ ॥
रसत्रिगुणलौहं च लौहतुल्यं च ताम्रकम् ।
वराटिकाया भस्माथ पारदत्रिगुणं कुरु ॥ ५७ ॥
| ९२४ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत्- |
|---|
नागवल्लीरसेनैव मर्दयेद्यत्नतो भिषक् ।
पुटेद्गजपुटे विद्वान् स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ५८ ॥
मधुना पिप्पलीचूर्णं सगुडां वा हरीतकीम् ।
अजाजीं वा गुडेनैव भक्षयेदनुपानतः ॥ ५९ ॥
यकृद्गुल्मोदरहरः प्लीहश्वयथुनाशनः ।
जीर्णज्वरं तथा पाण्डु कामलां च विनाशयेत् ॥
अग्निमान्द्यं च शमयेल्लोकनाथो रसोत्तमः ॥ ६० ॥
१-शुद्ध पारा, गन्धक और ताँबेकी भस्म ये सब समान भाग लेकर खरल कर लेवे। फिर इसमें पारेसे तिगुनी लोहेकी भस्म, ताम्रभस्म और कौडीकी भस्म एकत्र मिलाकर पानके रसमें खरल करके गजपुटमें रखकर फूँकदेवे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालकर पीसलेवे । इसको प्रतिदिन दो रत्ती प्रमाण खाय और ऊपरसे पीपलका चूर्ण, मधुके साथ या पुराना गुड और हरडका चूर्ण अथवा काले जीरेका चूर्ण गुडके साथ मिलाकर सेवन करे । यह रस यकृत्, गुल्म, उदर, प्लीहा, सूजन, पुराना बुखार, पाण्डु, कामला, मन्दाग्नि आदि विकारोंको नष्ट करता है। यह लोकनाथनामवाला रस सर्वोत्तम है ॥ ५६-६० ॥
रसगन्धौ समौ कृत्वा मर्दयेदर्द्धयामकम् ।
रसतुल्यं मृतं चाभ्रं द्विगुणं लौहताम्रकम् ॥ ६१ ॥
ताम्रस्य द्विगुणं भस्म कपर्दकसमुद्भवम् ।
नागवल्लीरसैर्घर्मे मर्दयेदतिनिर्जने ॥ ६२ ॥
ततो लघुपुटं दत्त्वा सुशीतं ग्राहयेत्तथा ।
द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैः खदिरत्वग्रसं पिबेत् ॥ ६३ ॥
यकृत्प्लीहोदरं शोथमग्निमान्द्यादिकं जयेत् ।
लोकनाथो रसो नाम सर्वज्वरविनाशनः ॥ ६४ ॥
२-शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर अर्द्ध प्रहरतक खरल करे । फिर इसमें पारेकी बराबर अभ्रकभस्म एवं लोहे और ताँबेकी भस्म पारेसे दुगुनी और ताँबेकी भस्मसे दुगुनी कौडीकी भस्म मिलाकर पानाके रसमें एक प्रहरतक खरल करके लघुपुटमें पकावे । जब स्वयं शीतल हो जाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको दो रत्ती भर लेकर अदरखके रसमें मिलाकर खावे और पीछेसे खैरके रसको पीवे तो यकृत् विकार,
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९२५
प्लीहोदर, शोथ, मन्दाग्नि और सर्व प्रकारके ज्वर नाश होते हैं। इसका नाम लोकनाथ रस है ॥ ६१-६४ ॥
बृहल्लोकनाथरस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले कुर्याच्च कज्जलम् । सूततुल्यं जारिताभ्रं मर्दयेत्कन्यकाम्बुना ॥ ६५ ॥ ततो द्विगुणितं दद्यात्ताम्रं लौहं प्रयत्नतः । सूतान्नवगुणं देयं वराटीसम्भवं रजः ॥ ६६ ॥ काकमाचीरसेनैव सर्वं तद्गोलकीकृतम् । ततो गजपुटे पाच्यं स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ६७ ॥ शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्धक २ तोले दोनोंको एकत्रकर कज्जली बनावे । फिर उसमें अभ्रकभस्म १ तोला मिलाकर घीग्वारके रससे खरल करे । तदनन्तर ताँबे और लोहेकी भस्म दो दो तोले एवं कौडीकी भस्म ९ तोले मिलावे । सबोंको मकोयके रसमें उत्तम प्रकार खरल करके गोला बनालेवे । पुनः इस गोलेको गजपुटमें स्थापन कर पकावे । जब पककर स्वाङ्गशीतल होजावे तब निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे ॥ ६५-६७ ॥
शिवं सम्पूज्य यत्नेन द्विजातीन्परितोष्य च । भक्षयेदस्य चूर्णस्य द्विगुञ्जं मधुना सह ॥ ६८ ॥ प्लीहानमुग्रमामं च यकृतं सर्वरूपिणम् । जीर्णज्वरं तथा गुल्मं कामलां हन्ति दारुणाम् ॥ ६९ ॥ इसके उपरान्त प्रतिदिन प्रातःकाल शिवजी महाराजका पूजन कर और ब्राह्मणोंको दान मानादिसे प्रसन्नकर इस चूर्णको दो रत्तीप्रमाण शहदमें मिलाकर सेवन करे तो यह बृहल्लोकनाथरस प्लीहा, अत्युग्र आमवात, सर्वप्रकारके यकृद्रोग, जीर्णज्वर, गुल्म और दारुण कामलादि रोगोंको दूर करता है ॥ ६९ ॥
प्लीहारिरस । पारदं गन्धकं टङ्कं विषं व्योषं फलत्रयम् । तोलकस्य समोपेतं जैपालं च तदर्द्धकम् ॥ ७० ॥ किंशुकस्य रसेनैव माषमात्रं तु मर्दयेत् । गुञ्जामात्रां वटीं कृत्वा छायायां शोषयेत्ततः ॥ ७१ ॥
| ९२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीह-यकृत्- |
|---|
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा और आमला ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला एवं शुद्ध जमाल गोटा सबसे आधा भाग लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर ढाकके रसमें एकमासपर्य्यन्त खरल-करे और एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे ॥
वाटिका प्रदातव्या शृङ्गवेररसेन च ।
गुदांकुरे गुल्मशूले प्लीहशोथे कफात्मके ॥ ७२ ॥
उदावर्ते वातशूले श्वासकासज्वरेषु च ।
रसः प्लीहारिनामाऽयं कोष्ठामयविनाशनः ॥
आमवातगदच्छेदी श्लेष्मा मयविनाशनः ॥ ७३ ॥
इस रसकी प्रतिदिन एक २ गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे गुदांकुर, गुल्मशूल, प्लीहा, शोथ, कफजन्य उदावर्त्त, वातशूल, श्वास, खाँसी और ज्वरादि-रोगोंमें शीघ्र आरोग्यता प्राप्त होती है । यह प्लीहारिनामकरस कोष्ठस्थित विकार, आमवात और कफोत्पन्न समस्त रोगोंको नष्ट करता है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
लौहमृत्युञ्जयरस ।
रसगन्धकलौहाभ्रं कुनटी मृतताम्रकम् ।
विषमुष्टिवराटं च तुत्थं शङ्खो रसाञ्जनम् ॥ ७४ ॥
जातीफलं च कटुकी द्विक्षारं कनकं तथा ।
हिङ्गु व्योषं सैन्धवं च प्रत्येकं सूततुल्यकम् ॥ ७५ ॥
श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वमेकत्र भावयेत्ततः ।
सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च ॥ ७६ ॥
सूर्यावर्तेन मतिमान् वटिकां कारयेत्ततः ।
प्लीहानं यकृतं गुल्ममष्ठीलां च विनाशयेत् ॥ ७७ ॥
अग्रमांसं तथा शोथं तथा सर्वोदरणि च ।
वातरक्तं च जठरमन्तर्विद्रधिमेव च ॥ ७८ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहा, अभ्रक, मैनसिल, ताँबेकी भस्म, कुचला, कौडीकी भस्म, नीलाथोथा, शंखभस्म, रसौंत, जायफल, कुटकी, जवाखार, सज्जी, जमाल गोटा, त्रिकुटा, हींग और सेंधानमक ये प्रत्येक एकएक तोला लेकर एकत्र कूट पीसलेवे । पश्चात् इस चूर्णको हुलहुल और बेलके पत्तोंके रसमें भावना देवे । फिर हुलहुलके रसद्वारा यथाविधि खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९२७
तैयार करलेवे । यह रस यथाविधि सेवन करनेपर प्लीहा, यकृत्, गुल्म, अष्ठील', अग्रमांस, सूजन, सर्व प्रकारके उदरसम्बन्धी रोग, वातरक्त, जठराग्नि और अन्त- र्विद्रधि रोगको दूर करता है ॥ ७४-७८ ॥
रोहीतकलोह ।
रोहीतकसमायुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः । प्लीहानमग्रमांसं च शोथं हन्ति न संशयः ॥ ७९ ॥
रोहेडेकी छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, वायविडङ्ग, नागर- मोथा और चीतेकी जड इन सबको समान भाग और सबको बराबर लोहभस्म मिलाकर शहदके साथ लोहेके पात्रमें खरल कर लेवे । यह लोह प्लीहा ( तिल्ली ), अग्रमांस तथा सूजनको सन्देहरहित नष्ट करता है ॥ ७९ ॥
चित्रकादिलौह ।
चित्रकं नागरं वासा गुडूची शालपर्णिका । तालपुष्पमपामार्गो मानकं कार्षिकत्रयम् ॥ ८० ॥ लौहमभ्रं कणा ताम्रं क्षारको लवणानि च । पृथक् कर्षांशमेतेषां चूर्णमेकत्र चिक्कणम् ॥ ८१ ॥ चतुःप्रस्थे गवां मूत्रे पचेन्मन्देन वह्निना । सिद्धशीतं समुद्धृत्य माक्षिकं द्विपलं क्षिपेत् ॥ ८२ ॥ चित्रकादिरयं लौहो गुल्मप्लीहोदरामयम् । यकृतं ग्रहणीं हन्ति शोथं मन्दानलं ज्वरम् ॥ कामलां पाण्डुरोगं च गुदभ्रंशं प्रवाहिकाम् ॥ ८३ ॥
चीतेकी जड, सोंठ, अडूसा, गिलोय, शालपर्णी, ताडके, फूल, चिरचिटा और मानकन्द ये प्रत्येक तीन तीन कर्ष, लोहा, अभ्रकभस्म, पीपल, ताम्रभस्म, जवाखार और पाँचोंनमक इनको पृथक् पृथक् एकएक कर्ष लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको चार प्रस्थ ( २५६ तोले ) गोमूत्रमें मन्द मन्द अग्निद्वारा पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतारले और शीतल होजानेपर उसमें ८ तोले उत्तम शहद मिलादेवे । इसका नाम चित्रकादि लोह है । यह गुल्म, प्लीहा, उदरविकार, यकृत्, संग्रहणी, सूजन, अग्निकी मन्दता, ज्वर, कामला, पाण्डुरोग, गुदभ्रंश, प्रवाहिका इत्यादि व्याधियोंको नाशता है ॥
| ९२८ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत्- |
|---|
यकृत्प्लीहारिलौह ।
हिङ्गुलसम्भवं सूतं गन्धकं लौहमभ्रकम् ।
तुल्यं द्विगुणताम्रं तु शिला च रजनी तथा ॥ ८४ ॥
जयपालं टङ्कणं च शिलाजतु समं रसात ।
एतत्सर्वं समाहृत्य चूर्णीकृत्य विमिश्रयेत् ॥ ८५ ॥
दन्ती त्रिवृच्चित्रकं च निर्गुण्डी त्र्यूषणं तथा ।
आर्द्रकं भृङ्गराजश्च रसैरेषां पृथक् पृथक् ॥
भावयित्वा वटीं कुर्याद्बदरास्थिमितां भिषक् ॥ ८६ ॥
सिंगरफसे निकलाहूआ पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, अभ्रक ये प्रत्येक एक एक तोला, ताँबा, मैनसिल और हल्दी ये प्रत्येक दो दो तोले, शुद्ध जमालघोटा, सुहागा और शिलाजीत ये प्रत्येक एक एक तोला लेवे । इन सबोंको एकत्रितकर बारीक चूर्ण करलेवे । अनन्तर इस चूर्णको दन्ती, निसोत, चीता, निर्गुण्डी, त्रिकुटा, अदरख और भाङ्गरा इनके रसमें अलग अलग भावना देकर बेरकी गुठलीकी समान गोलियाँ बनालेवे ॥ ८४-८६ ॥
प्लीहानं यकृतं चैव चिरकालानुबन्धनम् ।
एकजं द्वन्द्वजं चैव सर्वदोषभवं तथा ॥ ८७ ॥
हन्त्यादष्टोदरानाहज्वरं पाण्डुं च कामलाम् ।
शोथं हलीमकं हन्ति मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥ ८८ ॥
यकृत्प्लीहारिनामेदं लौहं जगति दुर्लभम् ॥ ८९ ॥
इसकी प्रतिदिन १-१ गोली सेवन करे तो यह प्लीहा, यकृतरोग, बहुत पुरानी प्लीहा, एकदोषजन्य, द्विदोषजन्य या त्रिदोषोत्पन्न आठों प्रकारके उदररोग, अफारा, ज्वर, पाण्डु, कमलवाय, हलीमक, सूजन, मन्दाग्नि, अरुचि आदि रोगोंका विनाश करती है । यह यकृत्प्लीहारिनामक लौह संसारमें दुर्लभ है ॥ ८७-८९ ॥
यकृदारिलौह ।
द्विकर्षं लौहचूर्णस्य गगनस्य पलार्द्धकम् ।
कर्षं शुद्धं मृतं ताम्रं लिम्पाकांघ्रित्वचः फलम् ॥ ९० ॥
मृगाजिनभस्मपलं सर्वमेकत्र कारयेत् ।
नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ९१ ॥
चिकित्सा०] भाषाटीकासहिता । ९२९
लोहभस्म दो कर्ष, अभ्रकभस्म दो तोले, ताँबेकी भस्म एक कर्ष, विहारी नींवूकी जडकी छाल ४ तोले और मृगछालाकी भस्म ४ तोले इन सबको एकत्र जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ९० ॥ ९१ ॥
यकृत्प्लीहोदरं चैव कामलां च हलीमकम् ।
कासं श्वासं ज्वरं हन्ति बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ ९२ ॥
यकृद्दरिनाम लौहं सर्वव्याधिनिषूदनम् ॥ ९२ ॥
यह यकृद्दरिनामक लौह यकृत, प्लीहा और उदरके रोग, एवं कामला, हलीमक, खाँसी, श्वास, ज्वर तथा अन्य सर्वप्रकारकी दुस्तर व्याधियोंको नष्ट करनेवाला और बल, वर्ण एवं जठराग्निको बढानेवाला है ॥ ९२ ॥
महामृत्युञ्जयलौह ।
शुद्धं सूतं समं गन्धं जारिताभ्रं समं तथा ।
गन्धस्य द्विगुणं लौहं मृतताम्रं चतुर्गुणम् ॥ ९३ ॥
द्विक्षारं सैन्धवविडं वराटीशंखभस्मकम् ।
चित्रकं कुनटी तालं रामठं कटुकं तथा ॥ ९४ ॥
रोहीतं त्रिवृता चिञ्चा विशाली धवलाङ्कठः ।
अपामार्गं तालरण्डमम्लिका च निशाद्वयम् ॥ ९५ ॥
प्रियंग्विन्द्रयवं पथ्या चाजमोदा यमानिका ।
तुत्थकं शरपुङ्खा च यकृन्मर्दो रसाञ्जनम् ॥ ९६ ॥
प्रत्येकं शाणमानेन भावयेदार्द्रकै रसैः ।
गुडूच्याः स्वरसेनापि मधुनः कुडवार्द्धकम् ॥ ९७ ॥
वटिकां कारयेद्वैद्यो गुञ्जाष्टप्रमितां पुनः ॥ ९८ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक औषधि एकएक भाग, लोहभस्म दो भाग, ताम्रभस्म ४ भाग एवं जवाखार, सज्जी, सेंधानमक, बिडनमक कौडीकी भस्म, शंखकी भस्म, चीता, मैनासिल, हरिताल, हींग, कुटकी, रोहिडावृक्षकी छाल, निसोत, इमलीकी भस्म, इन्द्रायनकी जड, सफेद ढेरा वृक्षकी छाल, चिरचिटेका खार, ताडकी जडका खार, अमलवेत, हल्दी, दारुहल्दी, फूलप्रियंगु, इन्द्रजौ, हरड, अजमोद, अजवायन, तूतिया, शरफोंका, रोहेडेकी छाल और रसौंत ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे । फिर सबको एकत्र चूर्ण करके अदरख और गिलो-
५९
| २३० | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत- |
|---|
यके रसमें उत्तम प्रकार खरल करे । तदनन्तर ८ तोले शहदमें खरल कर आठ आठ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ९३–९८ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वरोगकुलान्तकम् ।
अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्वा दोषानुसारतः ॥
प्लीहानं ज्वरमुग्रं च कासं च विषमज्वरम् ॥ ९९ ॥
आमवातं यकृच्छूलं श्वासमर्शः शिरोरुजम् ।
गुल्मशोथोदरानाहमग्रमांसं यकृत्क्षयम् ॥ १०० ॥
सकामलं पाण्डुरोगमुदरं च सुदारुणम् ।
रोगानीकविनाशाय केसरी करिणो यथा ॥ १०१ ॥
मृत्युञ्जयो महालोहः प्लीहगुल्मविनाशनः ।
प्राणिनां तु हितार्थाय शम्भुना परिकीर्तितः ॥ १०२ ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल इसमेंसे एक गोला खाय और पीछेसे दोषोंके बलाबलको विचारकर अनुपान सेवन करे । यह सम्पूर्ण रोगोंके समूहको नष्ट करता है एवं प्लीहा, अत्युग्र ज्वर, खाँसी, विषमज्वर, आमवात, यकृतका शूल, श्वास, बवासीर, शिरःपीडा, गुल्म, शोथ, दारुण उदररोग, अफारा, हृदयरोग, यकृत्, क्षय, कामला, पाण्डु और नानाप्रकारके उत्कट रोगसमूहरूपी हरतीको नाश करनेके लिये मृगेन्द्रकी समान है । यह महालोह प्लीहा तथा मृत्युको जीतनेवाला और गुल्मको शीघ्र नष्ट करनेवाला है । समस्त प्राणियोंके सुखके लिये शिवजी महाराजने इस योगको कथन किया है ॥ ९९–१०२ ॥
सर्वेश्वरलौह ।
शुद्धसूतं पलं गन्धं द्विपलं तु मृताभ्रकम् ।
त्रिपलं मृतताम्रं च पलार्द्धं स्वर्णमाक्षिकम् ॥ १०३ ॥
जैपालं चित्रकं मानं शूरणं घण्टकर्णकम् ।
ग्रन्थिकं त्रिफला व्योषं त्रिवृता खरमञ्जरी ॥ १०४ ॥
दण्डोत्पला वृश्चिकाली कुलिशं नागदन्तिका ।
सूर्यावर्त्तं च सञ्चूर्ण्य कर्षमात्रं विमर्दयेत् ॥ १०५ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैव चूर्णयित्वा पुनः क्षिपेत् ।
त्रिपलं लौहचूर्णस्य ततः खादेच्छुभेऽहनि ॥ १०६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९३१
सम्पूज्य भास्करं विष्णुं गणनाथं द्विजोत्तमम् ।
माषमात्रं च मधुना कृत्वा शीतलजलं पिबेत् ॥ १०७ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और अभ्रकभस्म प्रत्येक चार चार तोले, ताम्रभस्म १२ तोले, सोनामाखी २ तोले एवं जमालघोटा, चीता, मानकन्द, जिमीकन्द, घंटाकर्णक ( क्षुद्रक्षुपविशेष ), पीपलामूल, त्रिफला, त्रिकुटा, निसौत, चिरचिटा, श्वेतदण्डोत्पल, बिछूटीवृक्षकी जड, हडसंकरी, हाथीसुँडा और हुलहुल ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । प्रथम इस चूर्णको अदरखके रसमें अच्छे प्रकार खरल करले पश्चात् इसमें १२ तोले लोहेकी भस्म डालकर फिर खरल करे । तद्नन्तर प्रतिदिन प्रातःकाल पवित्र होकर गणेश, सूर्य और विष्णुभगवान्को पूजकर तथा ब्राह्मणों को प्रसन्नकर इस लोहकी एक मासाप्रमाण मात्राको शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल पान करे ॥ १०३–१०७ ॥
चूर्णं सर्वेश्वरं नाम सर्वरोगहरं पिबेत् ।
कठोरप्लीहनाशाय गुल्मोदरहरं तथा ॥ १०८ ॥
कामलां पाण्डुमानाहं यकृत्कृमिकृतामयान् ।
विचर्चामम्लपित्तं च कण्डूं कुष्ठं विनाशयेत् ॥ १०९ ॥
प्लीहानमस्रपित्तं चाप्यग्निमान्द्यं सुदुस्तरम् ।
श्रीकरं कान्तिजननं शुक्रायुर्बलवर्द्धनम् ११० ॥
यह सर्वेश्वरनामक लोह सर्वप्रकारके रोग, कठिनतर तिल्ली, गुल्म, उदरविकार, कामला, पाण्डु, आनाह, यकृत, कृमिरोग, विचर्चिका, अम्लपित्त, खुजली, कुष्ठ, प्लीहा, रक्तपित्त और दुस्तर मन्दाग्नि आदि व्याधियोंको नष्ट करनेवाला तथा शोभावर्द्धक, कान्त्युत्पादक, बल, वीर्य और आयुकी उन्नति करनेवाला है ॥ १०८–११० ॥
यकृत्प्लीहोदरहरलौह ।
लौहार्द्धमभ्रकं शुद्धं सूतमप्यर्द्धभागिकम् ।
त्रिगुणामयसश्चूर्णात् त्रिफलामभ्रकात्तथा ॥ ११ ॥
द्विरष्टं वारिणो भागमवशिष्टं तु कारयेत् ।
तेन चाष्टावशिष्टेन समेनाज्येन यत्नतः ॥ १२ ॥
९३२ भैषज्यरत्नावलीं । [ प्लीहा-यकृत्-
रसेन बहुपुत्राया द्विगुणक्षीरसंयुतम् । लौहमय्या पचेद् दर्व्या पात्रे चायसि मृन्मये ॥ १३ ॥ अभ्रकं निहितं शुद्धं पारदं च सुमूर्च्छितम् । अयसोऽर्द्धमितं चूर्णमादौ पाके विनिक्षिपेत् ॥ १४ ॥ लोहा एक तोला, अभ्रकभस्म आधा तोला, शुद्ध रससिन्दूर अभ्रकसे आधा भाग और लोहेके चूर्ण तथा अभ्रकसे तिगुना त्रिफला लेवे। इन सबको एकत्र कर १६ गुने जलमें पकावे। पकते पकते जब अष्टम भाग रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर इस क्वाथके साथ समान भाग गौका घी, शतावरका रस घीके बराबर और रससे दुगुना दूध मिलाकर विधिपूर्वक लोहेके या मिट्टीके पात्रमें करके मन्दमन्द अग्निसे पाक करे और लोहेकी करछीसे चलाता जाय ॥
कन्दं कपालिकां चव्यं विडङ्गं सबृहद्दलम् । शरपुङ्खा च पाठा च चित्रकं समहौषधम् ॥ १५ ॥ लवणानि च सर्वाणि सक्षारं वृद्धदारकम् । दीप्यकं च तथा स्नूहीं लौहाभ्रकसमां क्षिपेत् ॥ १६ ॥ फिर इसमें जिमीकन्द, कपालिका (कन्दविशेष), चव्य, बायविडङ्ग, लोध, शरफोंका, पाठ, चीता, सोंठ, पाँचों नमक, जवाखार, बिधारा, अजवायन और थूहकी जड इन सब औषधियोंको अलग अलग लोहे और अभ्रककी बराबर लेकर एकत्र मर्दन करके उपर्युक्त पाकमें डालकर उत्तम प्रकारसे पाक करे ॥ १५॥१६ ॥
प्लीहोदरयकृद्गुल्मान् हन्ति शस्त्राग्निभिर्विना । प्रयोज्योऽयं महावीर्यो लौहो लौहविदां वरैः ॥ प्लीहोदरविनाशाय दद्याद् द्वे द्वे पुटे पृथक् ॥ १७ ॥ इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह यकृत्प्लीहोदरहरनामक लोह सर्व प्रकारकी प्लीहा, उदररोग, यकृतरोग और गुल्मादिरोगोंको बिना शस्त्र व अग्निके नष्ट करता है। यह प्रयोग अत्यन्त वीर्यवान् और सर्व लोहोंमें उत्तम लोह है। इसमें औषधि सिद्ध होनेपर दो बार पुटपाक करलेवे तो प्लीहा और उदरविकार अवश्य शमन होते हैं ॥ १७ ॥
शङ्खद्रावरस ।
योगिनीभैरवाभ्यां च बलिमादौ प्रदापयेत् । पश्चाद्यन्त्रं प्रकर्त्तव्यमाहैवं परमेश्वरी ॥ १८ ॥
चिकित्सा ] भाषार्टीकासहिता । ९३३
रसः शङ्खद्रवो नाम शम्भुदेवेन भाषितः ।
गुह्याद् गुह्यतमं गुह्यमिदानीं कथ्यते मया ॥ १९ ॥
इसको बनानेसे प्रथम योगिनी और भैरवोंको बलिदान देवे पश्चात् यन्त्र बनावे, ऐसा महारानी पार्वती ने कहा है । यह शंखद्रावरस शिवजी महाराजका प्रकट किया हुआ है । यह रस गोप्य वस्तुओंमें भी अत्यन्त गोप्य है, अतः इसको गुप्त रखना चाहिये । अब मैं इस गुप्त रसका वर्णन करता हूँ ॥ १८ ॥ १९ ॥
शङ्खचूर्णं यवक्षारं सर्जिकाक्षारटङ्कणम् ।
समं च पञ्चलवणं स्फटिकारिर्निशादलः ॥ २० ॥
काचकुप्यां ततः क्षिप्त्वा वारुणीयन्त्रमुद्धरेत् ।
यामार्द्धे द्रावयत्येव शङ्खशुक्तिवराटिकाः ॥ २१ ॥
अर्शोसि नाशयेत्षट् च मूत्रकृच्छ्राश्मरीस्तथा ।
उदराष्टविधं हन्ति गुल्मप्लीहोदराणि च ॥ २२ ॥
अजीर्णं नाशयेच्छीघ्रं ग्रहणीं च विषूचिकाम् ।
भुक्तशेषे च भोक्तव्यो माषमात्रो रसोत्तमः ॥ २३ ॥
क्षणमात्राद्भवेद्भस्म पुनर्भोजनमिच्छति ।
प्रत्यहं भोजनान्ते च संसेव्योऽयं रसोत्तमः ॥ २४ ॥
न रुजायां भयं क्वापि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।
न देयं यस्य कस्यापि सदा गोप्यं च कारयेत् ॥
रसः शङ्खद्रवो नाम वैद्यानामुपकारकः ॥ २५ ॥
शंखका चूर्ण, जवाखार, सज्जी, सुहागा, पाँचों नमक, फटकरी और नौसादर इन सबोंको समान भाग लेवे । फिर एकत्र कूट पीसकर इस चूर्णको काँचकी शीशी में भरकर वारुणीयन्त्रमें द्रवीभूत करे । यह—शंख, सीपी और कौडीको आधे प्रहरमें ही गलादेता है । इसको भोजनके पश्चात् एक मासा प्रमाण सेवन करे तो तत्क्षण भोजन भस्म होजाता है और फिर भोजन करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है । इससे छः प्रकारके अर्श, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, ८ प्रकारके उदररोग, गुल्म, प्लीहोदर अजीर्ण, संग्रहणी और विषूचिका आदि रोग बहुत जल्द नष्ट होते हैं । इस उत्तम रसायनको प्रतिदिन प्रातःकाल और भोजनके पश्चात् सेवन करे । इसको सेवन करनेवाले मनुष्यको फिर कभी रोग आक्रमण नहीं करते, मैं बिल्कुल सत्य
| ९३४ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत्- |
|---|
कहत! हूँ। इस लिये यह रस हर किसीको नहीं देवे, सदैव गुप्त रखे। शंखद्राव-नामवाला यह रस वैद्योंको अत्यन्त उपकारक है ॥ १२०-२५ ॥
शंखद्रावक।
अर्कः स्नुही तथा चिञ्चा तिलारग्वधचित्रकम् ।
अपामार्गभस्म समं वस्त्रपूतं जलं हरेत् ॥ २६ ॥
मृद्वग्निना पचेत्तत्तु यावल्लवणतां गतम् ।
लवणेन समौ ग्राह्यौ द्वौ क्षारौ टङ्कणं तथा ॥ २७ ॥
समुद्रफेनं गोदन्तं कासीसं सोरका तथा ।
द्विगुणं पञ्चलवणं मातुलुङ्गरसेन च ॥ २८ ॥
काचकुप्यां तु सप्ताहं वासयेदम्लयोगतः ।
शङ्खचूर्णपलं दत्त्वा वारुणीयन्त्रमुद्धरेत् ॥ २९ ॥
सर्वधातून् हरेच्छीघ्रं वराटीशङ्खकादिकान् ।
रोगानामुदरादीनां सद्यो नाशकरः परः ॥ १३० ॥
आक, थूहर और इमलीकी छाल, तिल, अमलतास, चीतेकी जड और चिरचिटा सबकी भस्मको समान भाग लेकर जलमें घोललेवे । फिर वस्त्रमें छानकर जलको ग्रहण करे । पश्चात् इस जलको मन्द मन्द अग्निद्वारा पकावे । जब पकते पकते खारीपन आजाय तब जवाखार, सज्जी, सुहागा, समुद्रफेन, गोदन्ती, हरिताल, कसीस और सोरा ये सब समान भाग और पञ्च लवण सबसे दुगुने लेकर एकत्र कूट पीसकर काँचकी शीशीमें भरदेवे और ऊपरसे बिजौरे नींबूका रस डालदेवे । इस प्रकार खट्टे रसको मिश्रित करके एक सप्ताह तक रखा रहनेदेवे । फिर उसमें ४ तोले शंखका चूर्ण डालकर वारुणीयन्त्रके द्वारा अर्क खींचे । यह रस धातुगत सर्वदोष तथा उदरादि रोगोंको तत्काल नष्ट करता है और यह द्राव, शंख अथवा कौडी, सीपी आदिको शीघ्र द्रवीभूत करता है ॥ १२६-१३० ॥
महाशंखद्रावक ।
चिञ्चाऽश्वत्थः स्नुही ह्यर्कोऽपामार्गश्च हि पञ्चमः ।
पृथग् भस्मजलं कृत्वा तूद्धृत्य लवणानि च ॥ ३१ ॥
टङ्कणं च यवक्षारं सर्ज्जं लवणपञ्चकम् ।
रामठं तालकं चैव लवङ्गं नरसारकः ॥ ३२ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता। ९३६
जातीफलं च गोदन्तं ताप्यं गन्धरसं तथा ।
विषं समुद्रफेनं च सोरका स्फटिकारिका ॥ ३३ ॥
शंखचूर्णं शंखनाभिचूर्णं पाषाणसम्भवम् ।
मनःशिला च कासीसं समभागं च कारयेत् ॥ ३४ ॥
भावयेद्वेतसरसैः काचकूप्यां क्षिपेत्ततः ।
अत्र द्रवं च तद्दत्त्वा चोष्णस्थाने च धारयेत् ॥
वस्त्रेणाच्छादयेत्तावद्यावत्स्यात्सप्तवासरम् ॥ ३५ ॥
इमली, पीपलवृक्ष, थूहर, आक और चिरचिटा इन पाँचोंकी छालकी भस्मोंको समान भाग लेकर पानीमें अलग २ घोलकर छान लेवे । फिर इन क्षारजलोंको मन्द मन्द अग्निसे पकावे । पकते २ जब क्षारद्रव्य बाकी रहजाय तब उतारलेवे । पश्चात् यह क्षार एवं पाँचों नमक, सुहागा, जवाखार, सज्जी, हींग, हरिताल, लौंग, नौसादर, जायफल, गोदन्ती, हरिताल, सोनामाखी, बोल, शुद्ध मीठा तेलिया, समुद्रफेन, सोरा, फटकरी, शंखचूर्ण, शंखनाभिचूर्ण, पाषाणभेदका चूर्ण, मैनसिल और हीराकसीस इन सबको समान भाग लेकर एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे और फिर समस्त चूर्णको अम्लवेतके रसमें भावना देकर कपड़ौटी कीहुई काँचकी शीशीमें भरकर उष्ण स्थानमें रखदेवे और उसके मुखको अच्छेप्रकार वस्त्रसे ढककर ७ दिन-तक रखा रहनेदेवे ॥ ३१–३५ ॥
पश्चान्मन्दाग्निना देयं वारुणीयन्त्रमुद्धरेत् ॥ ३६ ॥
काचकूप्यां जलं दत्त्वा रक्षयेद्यत्नतः सुधीः ।
गुञ्जैकं पर्णखण्डेन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ३७ ॥
कासं श्वासं क्षयं प्लीहमजीर्णं ग्रहणीगदम् ।
रक्तपित्तं क्षतं गुल्ममर्शांसि च विनाशयेत् ॥ ३८ ॥
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च शूलमष्टविधं तथा ।
आमवातं वातरक्तं खञ्जवातं धनुस्तथा ॥ ३९ ॥
उदरामयमामं च स्थूलतां कृमिकोष्ठताम् ।
वार्तापित्तकफान्सर्वांन्नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ४० ॥
भुक्त्वा च कण्ठपर्यन्तं गुञ्जैकं च रसं लिहेत् ।
तत्क्षणात्कारयेद्भस्म तृणरा शिमिवानलः ॥ ४१ ॥