भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 954, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२२ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीहा-यकृत् - |
|---|
रसराज ।
गन्धकेन मृतं ताम्रं शुद्धगन्धकतुल्यकम् ।
द्वयोः पादं शुद्धरसं मर्दयेच्छूरणद्रवैः ॥
पुटेद्गजपुटे विद्वान् स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ४५ ॥
गन्धकद्वारा भस्म किया ताँबा १ तोला, शुद्ध गन्धक १ तोला शुद्ध पारा ६ माशे इन सबोंको जिमीकन्दके रसमें खरल करके गजपुटमें रख पुटपाक करे । जब पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे ॥ ४५ ॥
गुञ्जाद्वयं लिहेत्क्षौद्रैः प्लीहगुल्मविनाशनम् ।
यकृच्छूलं ज्वरं हन्ति कान्तिपुष्टिविवर्द्धनः ॥ ४६ ॥
रसराज इति ख्यातो रोगवारणकेसरी ॥ ४७ ॥
इसको दो रत्तीभर शहदमें मिलाकर चाटे तो प्लीहा, गुल्म, यकृद्रोग, शूल और ज्वरादि विकार नष्ट होते हैं । यह रसराज रोगरूपी हाथीको नाश करनेके लिये सिंहके समान है तथा कान्तिवर्द्धक और पुष्टिकारक है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
प्लीहान्तकरस ।
ह्रदशुल्बं च तारं च गगनायसमौक्तिकाः ।
दरदं पुष्पकं सूतं गन्धकं नवमं तथा ॥ ४८ ॥
गुग्गुलुस्त्रिकटू रास्ना तथा जैपालबीजकम् ।
त्रिफला कटुका दन्ती देवदाली तु सैन्धवम् ॥ ४९ ॥
त्रिवृता तु यवक्षारो वातारितैलमर्दितम् ।
अष्टोदराणि पाण्डुत्वमानाहं विषमज्वरम् ॥ ५० ॥
अजीर्णं कफमामं च क्षयं च सर्वशूलकम् ।
कासं श्वासं च शोथं च सर्वमाशु व्यपोहति ॥
प्लीहान्तको रसो नाम प्लीहोदरविनाशनः ॥ ५१ ॥
ताँबेकी भस्म, चाँदीकी भस्म, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मोतीकी भस्म, सिंगरफ़, काँसीकी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध गूगल, त्रिकुटा, रायसन, जमाल गोटा त्रिफला, कुटकी, दन्ती, कडवी तोरई, सैंधानोन, निसोत और जवाखार इन औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर अण्डीके तेलमें अच्छे प्रकार खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करे तो यह आठों प्रकारके उदररोग, पाण्डुरोग, अफारा, विषमज्वर, अजीर्ण, कफरोग, आमवात, क्षय, सब