भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९२१
तालपुष्पं कोकिलाक्षं चिञ्चाक्षारं सफेनकम् ॥
स्नुहीक्षीरसमायुक्तं प्लीहज्वरविनाशनम् ॥ ३९ ॥
गुड १०० पल, पीपलका चूर्ण १०० पल, हींग, त्रिकुटा, मानकन्द, सेंधानमक प्रत्येक दो दो कर्ष, चीता, विडनमक, जवाखार, सज्जी, चिरचिटेकी मूलकी भस्म, ताडके फूलोंकी भस्म, तालमखाना, इमलीका खार, समुद्रफेन और थूहरका दूध इन सबको दो दो कर्ष परिमाण लेकर कूटपीसकर पाँच पाँच रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसको सेवन करनेसे प्लीहा और ज्वर दूर होता है ॥ ३९ ॥
बृहद्गुडपिप्पली ।
विडङ्गं त्र्यूषणं कुष्ठं हिङ्गुलवणपञ्चकम् ।
त्रिक्षारं फेनकं वह्नि श्रेयसी चोपकुञ्चिका ॥ ४० ॥
तालपुष्पोद्भवं क्षारं नाड्यः कूष्माण्डकस्य च ।
अपामार्गस्य चिञ्चायाश्चूर्णानि चिक्कणानि च ॥ ४१ ॥
सर्वचूर्णसमं देयं चूर्णमत्र कणोद्भवम् ।
एतस्माद्द्विगुणाच्चूर्णात्पुराणो द्विगुणो गुडः ॥ ४२ ॥
मर्दयित्वा दृढे पात्रे मोदकानुपकल्पयेत् ।
भक्षयेदुष्णतोयेन प्लीहानं हन्ति दुस्तरम् ॥ ४३ ॥
यकृतं पञ्चगुल्मं च उदरं सर्वरूपकम् ।
जीर्णज्वरं तथा शोथं कासं पञ्चविधं तथा ॥
अश्विभ्यां निर्मिता श्रेष्ठा बालानां गुडपिप्पली ॥ ४४ ॥
वायविडङ्ग, त्रिकुटा, कूठ, हींग, पाँचों नमक, जवाखार, सज्जी, सुहागा, समुद्रफेन, चीतेकी जड, गजपीपल, कालाजीरा, ताडके फूलोंकी भस्म, पेठेकी डंडी, चिरचिटेकी जडकी भस्म और इमलीकी छालकी भस्म इन सब ओषधियोंका चूर्ण समान भाग और समस्त चूर्णके समान भाग पीपलका चूर्ण एवं सब चूर्णसे दुगुना पुराना गुड मिलाकर एकत्र दृढ पात्रमें उत्तम प्रकारसे खरल करके १ आना भरके लड्डू बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल गरम जलके साथ एक मोदक सेवन करे तो यह मोदक दुस्तर प्लीहा, यकृत, पाँचों प्रकारके गुल्म, सर्वप्रकारके उदरविकार, जीर्णज्वर, शोथ और पाँचों प्रकारकी खाँसी इत्यादि रोगोंको शीघ्र नष्ट करती है । यह गुडपिप्पली बालकोंके लिये अत्यन्त हितकारी है । इसको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है ॥ ४०-४४ ॥